कोरोना, लॉकडाउन के बीच जीवन के प्रति आस्था जगाने वाली ये कहानियां भी पढ़ लीजिए

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होम आइसोलेशन के सहायक नोडल अधिकारी डॉक्टर समीर तिवारी हर समय कोरोना मरीजों के साथ अन्य लोगों की सहायता करते हैं। हाल में तीन दिन पहले 43 वर्षीय जबड़ापारा निवासी एक व्यक्ति को घर पर सांस लेने में तकलीफ हुई।

मरीज ने कई बड़े अधिकारियों को फोन किया लेकिन किसी ने जवाब नहीं दिया। चूंकि होम आइसोलेशन वाले मरीजों के पास डॉक्टर समीर तिवारी का नंबर था तो उन्होंने फोन किया और रात दो बजे डॉक्टर समीर तिवारी मरीज के घर के बाहर एंबुलेंस लेकर गए और उसे कोविड अस्पताल में भर्ती करवाया।

कोरोना के पहले लहर में सिंधी कॉलोनी के हरेश पप्पी बजाज की मां, पिता व बहू को कोरोना हो गया। वे सिम्स में भर्ती थे। तब उनके बच्चों को खाना मिलने में बड़ी दिक्कतें हुई। किसी ने उनसे पूछा नहीं कि बच्चों ने खाना खाया या नहीं। ऐसे में बजाज कोरोना की दूसरी लहर में पॉजिटिव व क्वारेंटाइन लोगों के घर खाना पहुंचवा रहे हैं। 60 वर्ष से अधिक उम्र वालों को मुफ्त में पैक खाना जिसमें रोटी, चावल, दाल, सब्जी, अचार पहुंचवा रहे हैं। सुमित सेल्स के पास संदीप गुप्ता के परिवार के सातों लोग पॉजीटिव है।

तीन साल पहले हृदयघात से बचे हैं, उच्च रक्तचाप और हृदय रोग से पीड़ित हैं इसके बाद भी मदद के लिए अस्पतालों से फोन आने पर परिजनों के लिए खाना और मदद लेकर पहुंचते हैं। यह कहानी है बिलासपुर के दुर्गेश सोनी की। चरामेती से जुड़े हैं, कोरोना काल में अब तक पूरे प्रदेश में संस्था ने 200 प्लाज्मा डोनेशन करा चुके हैं। बिलासपुर में 26 हजार खाने का पैकेट बांट चुके हैं। दुनिया के कदम इस कोरोना काल में थम गई है, कोरोना का भय लोगों में साफ दिख रहा है। दुर्गेश बताते हैं कि उनके परिजन और दोस्त उनकी तबीयत को देखते हुए मना करते हैं।

सतबहनिया मंदिर के पास रहने वाली आशा गोंड़ कैंसर से पीड़ित थी। उनकी बेटी मानसिक रूप से कमजोर है। इसकी जानकारी नीति श्रीवास्तव को लगी तो उन्होंने परिचितों के सहयोग के माध्यम से उसका इलाज शुरू कराया। उन्हें शहर के एक निजी अस्पताल में भी भर्ती कराया गया। लेकिन वे कैंसर के अंतिम स्टेज थी इस कारण वे नहीं बच पाईं। उनकी मृत्यु के बाद जब अंतिम संस्कार के लिए मदद की जरूरत पड़ी तो पंजाबी समाज के द्वारा खर्च उठाया गया। इसमें सेवादार ग्रुप के मनजीत सिंह अरोरा सहित अन्य ने योगदान दिया।

सामाजिक कार्यकर्ता अभिजीत मित्रा (रिंकू) पिछले संक्रमण काल से ही सेवा कार्य कर रहे हैं। मित्रा ने बताया कि जब संक्रमण से पहली मौत हुई थी, वहां मैं गया था। वहां की स्थिति देखकर मैं बहुत दुखी हुआ, क्योंकि जिनकी मृत्यु हुई थी, उनके पास तक जाना मना था। इसके बाद से जिसके भी संक्रमण की जानकारी मुझे होती है, उनका पता लगाता हूं कि उन्हें किसी की जरूरत तो नहीं है। अब तक 400 से अधिक लोगों के घर दवा देना, खाना पहंुचाना आदि कार्य कर रहा हूं। इसके अलावा 37 से अधिक संक्रमण से मौत होने वाले लोगों को मुखाग्नि भी दे चुके हैं।

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