सत्ता के लिए धमकियां, जोड़-तोड़, लोकतंत्र का मज़ाक और बेचारी जनता!

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जयपुर। देखिये ये सियासत है और सियासत की लालच में सब लंगूर हो जाते हैं। जनता बेवकूफ बन जाती है। ऐसा लगता है कि जनता ने सरकार चुनी है, पर दरअसल ऐसा होता नहीं है। जनता तो केवल वोट देती है और उसके वोट देने से सिर्फ जीत और हार का फैसला होता है, सरकार बनाने का नहीं।

कर्नाटक में यही तो हो रहा है। जनता ने किसी को भी बहुमत नहीं दिया, पर अब तीन पार्टियां सरकार बना लेने का दावा कर रही हैं। भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी पर बहुमत के आंकड़े से 8 सीटें पीछे रह गई। भाजपा सरकार बना लेने का दावा कर रही है, भले ही जनता ने उसे पूरा समर्थन ना दिया हो।

उधर बहुमत ना मिलते ही जेडीएस को कांग्रेस ने समर्थन बिना शर्त के दे देने का फैसला किया। जो दो पार्टी पूरे चुनाव में एक दूसरे को कोसते रही, तमाम तरह के आरोप लगाती रही, वो अब ये कह रही हैं कि सांप्रदायिक तत्वों को सत्ता से दूर रखने के लिए दो सेक्युलर लोगों का साथ आना ज़रुरी है।

सत्ता की लालच किस तरह से दो राजनीतिक दलों की सोच कुछ घंटे में ही बदल देती है, ये राजनीति की थोड़ी समझ रखने वाली जनता को साफ समझ लेनी चाहिये। चूहे-बिल्ली का खेल इन्होंने सत्ता को समझ के रखा है।

भाजपा खुले तौर पर कह रही है कि वो ज़रुरी 8 विधायकों का समर्थन जल्द से जल्द हासिल कर लेगी। पर, कैसे? खरीद के? या फिर मंत्री बनाने का लालच देकर। इस गंदगी में कांग्रेस भी कौन सी दूध से धुली लग रही है। अभी अभी एक कांग्रेसी नेता एमबी पाटिल ने दावा किया है कि भाजपा के 6 विधायक उनके समर्थन में है। वो भी क्या विधायकों को खरीदने की बात अप्रत्यक्ष रूप से कह रही है।

ये सब नाटक जनता के बीच में, जनता के सामने और जनता के लिए चल रहा है। तो हो गया ना जनता का, जनता को और जनता के लिए। ऐसा लग रहा है कि जनता को ज़बर्दस्ती बताया जा रहा हो कि देखो हम जो कह रहे हैं, वो ही संविधान है।

अब राज्यपाल की भूमिका। राज्यपाल को राज्यों में संविधान का पालन करने के लिए भेजा जाता है। लेकिन आज के समय में राज्यपाल को केंद्र सरकार अपनी पार्टी के पुराने नेताओं में से भेजती है। मतलब अब उसका जो भी फैसला होगा, नो उसकी पार्टी के फैसले से मिलता जुलता होगा, उसकी सोच उसी पार्टी के सोच के रूप में अप्रत्यक्ष रूप से मिलती जुलती रहेगी।

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