‘बबुआ’ और ‘बुआ’ के साथ आने से देश की राजनीति में क्या फर्क आएगा?

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राजनीति में कोई किसी का सगा नहीं होता और कोई किसी का दुश्मन भी नहीं होता। ये बात साबित कर दी है, देश की सबसे ज़्यादा लोकसभा सीट वाले राज्य उत्तर प्रदेश के दो बड़े दलों ने हाथ मिलाकर। जब 1977 में जनता दल का उदय हुआ था, तब कहा गया कि ये कांग्रेस की सबसे बड़ी दुश्मन पार्टी है। लेकिन उसी जनता दल से टूट कर बने समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल और जनता दल यूनाइटेड जैसी पार्टियां ने कभी कभी कांग्रेस का समर्थन किया या कर रहे हैं।

नार्थ-ईस्ट के दो राज्यों में अपनी सरकार और एक राज्य में गैर-कांग्रेसी सरकार बनाने के जश्न में डूबी भाजपा को उस समय अप्रत्यक्ष रुप से झटका लगा जब उत्तर प्रदेश में 11 मार्च को गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीट पर होने जा रहे उपचुनाव के लिए बसपा ने सीधे तौर पर समाजवादी पार्टी को समर्थन देने का फैसला कर लिया। बसपा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके ये बात कही और पर आगामी लोकसभा चुनाव में ये गठबंधन साथ रहेगा इसपर अभी फिलहाल मायावती ने मना कर दिया है।

उत्तर प्रदेश में 11 मार्च को गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीट पर लोकसभा के उपचुनाव होने हैं। ये दोनों सीट यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ और डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के इस्तीफा देने के बाद खाली हो गई थीं। कांग्रेस ने इस उपचुनाव के लिए पहले ही उम्मीदवार घोषित कर दिये थे और इसके अगले ही दिन सपा ने भी अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी थी। बसपा ने पहले ही कह दिया था कि वो ये उपचुनाव नहीं लड़ेगी, पर वो सीधे तौर पर सपा के उम्मीदवारों को समर्थन देने का फैसला करेगी, ये किसी ने शायद किसी ने सोचा भी नहीं होगा। ये दोनों सीटें सीएम योगी के लिए काफी मायने रखती हैं, और राज्य तथा देश को इसके नतीजों से एक संदेश जाएगा ये तो योगी जी को भी पता होगा।

कांग्रेस के लिए अच्छी स्थिति

सपा और बसपा का एक साथ आना कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी खुशखबरी हो सकती है। हालांकि कांग्रेस ने अपने उम्मीदवार इस उपचुनाव में खड़े किये हैं, लेकिन मायावती और अखिलेश के इस घोषणा के बाद कांग्रेस आगे की रणनीति बहुत सोच कर बनाएगी और ये उम्मीद की भी जानी चाहिये कि 80 लोकसभा वाली उत्तर प्रदेश में कांग्रेस आखिर में इन दोनों मज़बूत पार्टियों से हाथ ज़रुर मिलाएगी। बसपा ने अपने प्रेस कान्फ्रेंस में कांग्रेस को भी याद किया और कहा कि अगर वो राज्यसभा में मध्य प्रदेश की सीटों के लिए बसपा का समर्थन करेगी तो वो वापस से उत्तर प्रदेश में राज्यसभा के लिए कांग्रेस का समर्थन करेगी। ऐसा कांग्रेस को झक मारकर करना ही पड़ेगा।

कांग्रेस के लिए ये किसी खुशखबरी से कम नहीं हो सकती है। कांग्रेस को ये बात पता है कि ये दोनों पार्टिया क्षेत्रीय पार्टियां हैं और आज भी कांग्रेस देश में दूसरे नंबर की पार्टी है। इन दोनों पार्टियों की विचारधारा भाजपा से अलग है और वोट भी इन्हें इसी वजह से मिलते हैं तो फिलहाल के वक्त तो ये दोनों कभी भाजपा के पास नहीं जाएंगे। अगले लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस को इन दोनों की ज़रुरत पड़ेगी ही।

हालांकि योगी ने इस गठबंधन पर चुटकी ली है लेकिन भाजपा को भी ये बात पता होगी कि इन दोनों के साथ आ जाने से राज्य और देश की राजनीति में सीधे तौर पर फर्क आएगा। अल्पसंख्यक, दलित और यादव वोट यूपी में काफी मायने रखते हैं। अगर इन तीनों को सपा और बसपा ने गोलबंद कर लिया तो सबसे बड़ा नुकसान भाजपा को ही होगा और राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस तो है ही।

राजनीति में कुछ भी कभी भी स्थिर नहीं होता है और यूपी की राजनीति में अभी जो हुआ, वो इसी का एक उदाहरण है। आज के समय में भाजपा देश में बहुत मज़बूत है लेकिन ठीक एक साल बाद लोकसभा चुनाव का जब मौसम आएगा तब तक देश की राजनीति क्या रंग लाती है, ये किसी को पता नहीं है। फिलहाल ‘बबुआ’ और ‘बुआ’ के साथ आ जाने के बाद यूपी की पॉलिटिक्स जनता के लिए काफी रोचक हो सकती है, क्योंकि लोकतंत्र में जनता ही दर्शक है और जनता ही फैसला करती है।

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