क्या है किसान बिल और क्यों पूरे देश के किसान कर रहे हैं इसका विरोध?

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मोदी सरकार द्वारा 14 सितंबर को लोकसभा में पेश किए गए थे 3 किसान विधेयक जिन पर अब सिर्फ राष्ट्रपति की मुहर लगना बाकी रह गया है। इन किसान विधेयक पर विपक्ष के साथ साथ देश के किसान भी काफी आक्रोश में नजर आ रहे हैं और देश में पिछले कुछ समय से इनका विरोध जोरो शोरो से देखा जा सकता है। भारतीय किसान संघ जो कि भाजपा का एक समर्थक है वह भी इस बिल पर सुधार की मांग कर रहा है।
क्या है किसान बिल?
सरकार ने इसमें तीन प्रकार के विधेयक पेश किए थे।
1. द फार्मर प्रोड्यूसर ट्रेड एंड कमर्स (प्रमोशन एंड फैसिलिटेशन) बिल
इस विधेयक के अनुसार किसान अपने उपज को भारत के किसी कोने में बेच सकता है। किसानों को अपने उपज को सीधा कॉरपोरेट कंपनियों को बेचने के लिए प्राइवेट मंडी की स्थापना की जाएगी और प्राइवेट मंडियों मैं किसी प्रकार का टैक्स नहीं लगाया जाएगा जोकि सरकारी मंडियों से काफी अलग है क्योंकि एपीएमसी की मंडियों में सरकार द्वारा टैक्स लगाया जाता है। इस विधेयक के अनुसार किसान अपनी उपज को किसी भी पैन कार्ड धारी को बेच सकता है।
2.द फार्मर (एंपावरमेंट एंड प्रोटेक्शन) एग्रीमेंट ऑन प्राइस एश्योरेंस एंड फॉर्म सर्विसेज
इस विधेयक के अनुसार किसान कॉर्पोरेट कंपनियों से अपनी उपज को बेचने के लिए 5 से 6 महीने पहले ही कॉन्ट्रैक्ट कर सकता है, लेकिन इस विधायक में मिनिमम सपोर्ट प्राइस से वंचित रखा गया है यानी कि कॉरपोरेट कंपनियां कितने भी कम दाम में किसान से उसका उपज खरीद सकती है और इस पर सरकार का कोई रोकथाम नहीं होगा।
3. द एसेंशियल कमोडिटीज (अमेंडमेंट) बिल 2020
इस विधि के अनुसार कोई भी व्यक्ति कितना भी उपज खरीद सकता है और उसका भंडार अपने पास जमा कर रख सकता है। इससे पहले एपीएमसी में उपज को खरीदने और उसका भंडार रखने की सीमा तय की गई थी। उपज का भंडार रखने पर सरकार ने सारी सीमाएं हटा ली है और मात्र किसी प्रकार के आपातकाल के दौरान ही इस पर संज्ञान सरकार द्वारा लिया जाएगा।
किस बात पर कर रहे हैं विपक्ष और किसान प्रदर्शन?
किसान और विपक्ष का मानना है कि अगर प्राइवेट मंडियों की स्थापना की गई और उन पर किसी प्रकार का टैक्स भी नहीं लगाया गया तो एक समय बाद एपीएमसी मंडिया ध्वस्त हो जाएगी और उसके बाद किसानों के पास कॉरपोरेट कंपनीज को उपज बेचने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचेगा। ऐसी परिस्थिति आने के बाद किसानों को मजबूरन कॉरपोरेट कंपनियों को कम दामों पर अपनी उपज बेचने को मजबूर होना पड़ सकता है क्योंकि तब उनके पास और कोई रास्ता नहीं बचेगा। इसका एक जीता जागता उदाहरण बीएसएनएल टेलीकॉम कंपनी जोकि एक सरकारी कंपनी है उसको माना जा सकता है, जब इस व्यापार में प्राइवेट कंपनियों ने निवेश किया उसके चंद सालों बाद बीएसएनल बंद होने के करीब पहुंच गई। अगर ऐसी परिस्थिति किसान के उपज बेचने को लेकर आई तो यह उनके लिए काफी संकट का समय साबित हो सकता है क्योंकि तब उनके उपज का मूल्य तय करना कारपोरेट कंपनियों के हाथ में होगा और कारपोरेट कंपनियों का मुख्य उद्देश्य फायदा कमाना होता है।
किसानों की एक मांग यह भी है कि सरकार को एमएसपी बरकरार रखना चाहिए चाहे वह प्राइवेट कंपनियों को ही क्यों ना अपनी उपज बेच रहे हो। दूसरे विधेयक के अनुसार कॉरपोरेट कंपनियां किसानों का उपज खरीदने के लिए पहले ही मूल्य तय कर कॉन्ट्रैक्ट कर सकती हैं। इस दौरान अगर सरकारी मंडियां ध्वस्त हो गई तो किसानों को मजबूरन कंपनियों से कम मूल्य पर उपज बेचने का कॉन्ट्रैक्ट करना पड़ सकता है। भारत में 85% से अधिक छोटे किसान हैं जिनके पास 2 हेक्टेयर से कम खेत मौजूद है जिनके लिए बड़े कारपोरेट कंपनियों से भाव में तोल मोल करना काफी मुश्किल होगा सकता है।
तीसरे विधेयक के अनुसार सरकार ने उपज की भंडार रखने पर अब कोई सीमा तय नहीं की है जिसका परिणाम यह भी हो सकता है कि बड़े पूंजीपति और कॉरपोरेट कंपनियां उपज का भंडार खरीद कर अपने गोदामों में रख सकती हैं, जिसके कारण देश में इन वस्तुओं की कालाबाजारी शुरू हो सकती है और इन वस्तुओं के मूल्य में एकाएक बढ़ोतरी भी देखी जा सकती है। मूल्य में बढ़ोतरी होने के बाद पूंजीपति और कॉरपोरेट कंपनियां अपने भंडार को ज्यादा दामों पर बेचकर मुनाफा कमा सकती हैं। जिसका सीधा असर आम जनता और किसानों पर पड़ेगा।
किसानों का यह भी कहना है कि भंडार पर से सीमा हटा देने के कारण बड़ी कंपनियां और पूंजीपति उपज का भंडार जमा कर किसानों को कम दाम पर अपनी अगली पैदावार को बेचने के लिए मजबूर कर सकते हैं। यह सारी परिस्थितियां एपीएमसी के ध्वस्त होने के बाद आने की आशंका जताई जा रही है।
किसान और कॉरपोरेट कंपनियों के बीच हुए कॉन्ट्रैक्ट में किसी भी प्रकार का विवाद होने पर किसान को सीधे सिविल कोर्ट जाने की भी अनुमति नहीं है। ऐसी परिस्थिति में सुला बोर्ड की कल्पना पेश की गई है जिसमें दोनों पक्षों के प्रतिनिधि मौजूद रहेंगे। यह दोनों पक्षों के बीच समझौता कराया जाएगा जिसके लिए 30 दिन का समय निर्धारित किया गया है। यहां पर सुलाना होने के बाद दोनों पक्षों को एसडीएम के पास जाना होगा जहां वह दोनों पक्षों का सुला कराने की कोशिश करेंगे जिसके लिए भी 30 दिन का समय दिया जाएगा और एसडीएम के आदेश को सिविल कोर्ट के आदेश के बराबर मान्यता दी जाएगी। यहां पर भी सुला ना होने के बाद दोनों पक्ष कलेक्टर के पास जा सकते हैं जिसका आदेश भी सिविल कोर्ट के आदेश के बराबर माना जाएगा। ऐसे में किसान आरोप लगा रहे हैं कि विवाद का फैसला एसडीएम और कलेक्टर राजनैतिक दबाव या कॉरपोरेट कंपनी के दबाव में दे सकते हैं जिसके कारण किसानों को न्याय नहीं मिल पाएगा।
एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केट कमिटी यानी कि साधारण भाषा में सरकारी मंडी में काफी कमियां है इसे माना जा सकता है और सरकारी मंडियों में सुधार की भी बहुत आवश्यकता है लेकिन इसे खत्म करना इसका उपाय नहीं हो सकता। किसानों का मानना है कि यह सारे विधेयक कॉर्पोरेट कंपनियों की ज्यादा फायदे के लिए हैं ना कि किसानों के लिए, किसानों की एक और मांग यह भी एमएसपी को उनका अधिकार बनाया जाए।

किसानों के लगातार विरोध और आक्रोश के बावजूद सरकार ने अभी तक इस विधेयक में कोई संशोधन नहीं किया है और अब इस पर राष्ट्रपति ने भी हस्ताक्षर कर दिया है जिसके बाद यह विधेयक कानून बन गया। सरकार को किसानों की मांगों को सुनकर विधेयक में कुछ संशोधन करना चाहिए था, अगर जिसके लाभ के लिए कानून बनाए जा रहे हैं उन्हें ही ना पसंद आए तो ऐसे कानून का क्या फायदा। किसानों को अगर इस फिल्म को लेकर कोई भ्रम है जैसा कि सरकार कह रही है तो सरकार की यह जिम्मेदारी बनती है की किसानों से बातचीत कर इस भ्रम को दूर किया जाए।

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