जानिए संथारा के बारे में जिसे जैन धर्म में कहा जाता हैं, फेस्टिवल ऑफ डेथ

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आपको बता दें, कि वैसे तो हर धर्म में कोई न कोई परंपरा होती हैं, वही हर धर्म की परंपराओं का अपना एक महत्व और अहम वजह होती हैं, जिसके कारण लोग उस परंपरा का पालन करते है। वही जैन धर्म की परंपराओं के मुताबिक संथारा लेने वाला मनुष्य मृत्यु आने तक खान पानी का बहिष्कार कर देते हैं। वही जैन धर्म के लोग इस व्रत को फेस्टिवल ऑफ डेथ कहा जाता हैं। वही आज हम आपको जैन धर्म के संथारा व्रत से जुड़ी कुछ अहम और महत्वपूर्ण बातों के बारे में बताने जा रहे हैं। तो आइए जानते हैं कि वो कौन सी बातें हैं।

आपको बता दें, कि संथारा लेने वाले मनुष्य का खान पान जबरदस्ती बंद करा दिया जाता हैं या वह स्वेच्छा से इसका त्याग भी कर देते हैं। वही अक्सर मृत्यु को करीब देखने के बाद ही मनुष्य इसे लेने का फैसला करता हैं। वही जैन ग्रंथों की मान्यताओं के मुताबिक संथारा में नियम के अनुसार ही मनुष्य को भोजन दिया जाता हैं वही अन्न बंद करने का फैसला तभी लिया जाता हैं, जब अन्न का पाचन संभाव न रह जाए।

वही संथारा में उपवास करने के दो तरीके को बताया गया हैं। इसे लेने वाले मनुष्य पर यह निर्भर करता हैं कि वह संथारा के दौरान पानी पीना चाहता हैं या फिर नहीं। इसमें किसी भी तरह के खाने को पूरी तहर से बहिष्कृत किया जाता हैं। वही संथारा लेने वाले व्यक्ति को पहले अपने परिवार या फिर गुरु से इसे धारण करने की आज्ञा लेनी पड़ती हैं। वही इसके बाद अगर परिवार या फिर गुरू इसकी इजाजत देता हैं, तो इसे लिया जा सकता हैं। वही संथारा के व्रत के बीच में भी व्यक्ति डॉक्टरी सलाह को ले सकता हैं। वही इससे व्रत नहीं टूटता हैं। वही आमतौर पर लोग ज्यादा तबीयत के खराब होने पर ही डॉक्टर्स की मदद या फिर सहायता लेते हैं।

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