त्रिपुरा में हार के बाद कम्युनिस्ट पार्टी को क्या सीख मिली?

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त्रिपुरा में भगवा झंडा लहरा चुका है। अब चुनाव के बाद बस भाजपा की सरकार बनने की देरी है। पिछले करीब 27 सालों से कम्युनिस्ट पार्टी का त्रिपुरा में सूर्य अस्त हो चुका है। इससे पहले पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने लेफ्ट की 25 साल की पुरानी सरकार को ध्वस्त कर दिया था। इसके बाद लेफ्ट अबतक बंगाल में वापसी भी नहीं कर पाई है।

कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार अब सिर्फ केरल में बची है। पिछले महीने केरल में ही कम्युनिस्ट पार्टियों की बैठक हुई थी। इस बैठक में दोनों पार्टियों के दो बड़े नेताओं के बीच तल्खियां देखने को मिली थी। प्रकाश करात और सीताराम येचुरी के अपने अपने विचारों के वजह से मतभेद सबके सामने आ गए थे। प्रकाश करात जहां कांग्रेस का साथ ना देने की बात कर रहे थे, वहीं येचुरी केंद्र में कांग्रेस को सहयोग देने की बात कह रहे थे।

त्रिपुरा में हार के बाद कम्युनिस्ट पार्टी ये तो समझ ही सकती है कि अगर उसे अपना अस्तित्व बचा कर रखना है तो कांग्रेस का साथ देना होगा। त्रिपुरा में अगर वो कुछ सीटों के लिए कांग्रेस से गठजोड़ कर लेती तो शायद इसका फायदा उसे हो सकता था। लेफ्ट ने पहले भी केंद्र में यूपीए में शामिल रहने का फैसला किया था और 10 साल तक कांग्रेस की साथी रही थी।

लेफ्ट की राजनीति अल्पसंख्यकों, दलितों, आदिवासियों की है। जबकि भाजपा की राजनीति पूरे हिंदुत्व की है। विचारधाराओं की बात की जाए तो लेफ्ट और भाजपा ठीक एक दूसरे से अलग और उलट हैं। कांग्रेस भी इसी तरह की पार्टी है। कांग्रेस और लेफ्ट दोनों को चाहिये कि अगर वो सत्ता से भाजपा को दूर रखना चाहती है तो एक-दूसरे से कुछ राज्यों में हाथ मिला ले। ऐसे अलग चुनाव लड़ने से वो एक-दूसरे का वोट काटने का ही काम कर सकते हैं। उम्मीद भी यहा की जा रही है कि इस हार के बाद कम्युनिस्ट पार्टी फिर से कांग्रेस का साथ निभाने का सोच सकती है।

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