शिक्षक दिवस विशेष: ‘गुरुर्बह्मा, गुरुविष्णु: गुरुर्देवो महेश्वर…

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सद्गुरू कबीर की वाणी ‘गुरु गोबिंद दोऊ खड़े काके लागूं पाय, बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताए’ अपने आप में गुरू की समुचित व्याख्या है। यानि गुरू का पद भगवान से भी ऊंचा माना गया है। क्यों कि गुरू ही अपने शिष्य को भगवान की महत्ता का परिचय कराता है।

गुरू ही अपने शिष्य को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है ​यानि उसके अंदर व्याप्त अज्ञानता को दूर कर उसे ज्ञान से आलोकित करता है। ये परंपरा पहले भी और आज भी प्रासंगिक है कि गुरू या शिक्षक से असली ज्ञान उस पर विश्वास और सम्मान देकर ही हासिल की जा सकती है।

टीचर या गुरू जब अपने शिष्यों या फिर छात्रों को जो कुछ भी ज्ञान देता है उसमें उसका संपूर्ण अनुभव निहीत होता है। ऐसे में स्टूडेंट को अपनी टीचर की बातों को गंभीरता से सुनते हुए उसे व्यवहारिक रूप से अपने जीवन में धारण करने की कोशिश करनी चाहिए। बिना किसी द्वेष के संयमित होकर परिश्रम करने ही से ही शिष्य सफलता की सीढ़ियां चढ़ता है।

जब तब शिष्य अपने शिक्षक की बातों को आत्मसात नहीं करता उसके द्वारा शिक्षक दिवस का पर्व मनाना सार्थक नहीं होगा। शिक्षक भी उसी कुम्हार की तरह होता जो छात्र रूपी कच्ची मिट्टी को पहले कड़ाई कूटता है फिर उसे बड़े प्यार से अपनी रचना के द्वारा सुंदर रूप प्रदान करता है।

जब कोई शिष्य सफलता के जितने ही शीर्ष पर पहुंचता है गुरू खुद को उतना ही सम्मानित और गौरवान्वित महसूस करता है। किसी भी सफल व्यक्तित्व के पीछे माता—पिता का हाथ तो होता ही है लेकिन वो व्यक्ति सदा के लिए अपने गुरू का भी ऋणी होता है।

गुरू किसी भी व्यक्ति को सबसे पहले मानव से इंसान बनाता है। गुरू अपने शिष्य को प्यार, सम्मान, विनय, ज्ञान, स्वाभिमान, परहित आदि बातों से परिपूर्ण कर देता है। अपने गुरू के ज्ञान को आत्मसात करने वाले लोग ही आज दुनिया के शीर्ष पर बैठे हुए हैं।

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