यूं ही माथे पर नहीं लगाया जाता तिलक…

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माथे पर तिलक या फिर टीके लगाने का महत्व विशेष होता हैं,भारतीय परंपरा में तिलक या फिर टीका लगाना अनिवार्य धर्मकृत्य हैं। धर्मकृत्यों के नियामक ऋषि एक साथ वैज्ञानिक भी थे और दार्शनिक भी थे। इसलिए किसी भी प्रचलन की स्थापना में दोनों ही दृष्टियों को ध्यान में रखा गया हैं।

तिलक हमेशा से भ्रूमध्य या फिर आज्ञाचक्र के स्थान पर लगाया जाता रहा हैं,और शरीर शास्त्र के मुताबिक और दृष्टि से भी यह स्थान पीनियल ग्रंथि का हैं। प्रकाश से इसका गहरा रिश्ता होता हैं। वही एक प्रयोग में जब किसी की आंखों पर पट्टी बांधकर,सिर को ढक दिया गया और उसकी पीनियल ग्रंथि को उद्दीप्त किया गया था। तब उसे मस्तक के अंदर प्रकाश की अनुभूति महशूस हुई ​थी।

आपको बता दें कि वही ध्यान-धारणा के वक्त साधक के चित्त में जो प्रकाश अवतरति होता हैं,वह उसका संबंध इस स्थूल अवयव से अवश्य हो जाता हैं। दोनों भौंहों के बीच कुछ संवेदनशीलता होती हैं। वही यदि हम अपनी आंखें बंद करके बैठ जाएं और कोई व्यक्ति भ्रूमध्य के निकट ललाट की तरफ तर्जनी उंगुली ले जाए तो कुछ विचित्र सा ही अनुभव होने लगता हैं। आपको बता दें कि यही तृतीय नेत्र की प्रतीति हैं।

इसे अपनी उंगुली भृकुटि मध्य लाकर भी अनुभव किया जा सकता हैं।इसलिए जब यहां पर तिलक या फिर टीका लगाया जाता हैं। तो उससे आज्ञाचक्र को भी नियमित स्फुरण मिलती रहती हैं,और इसलिए टीका लगाया जाता हैं, इसके धार्मिक और वैज्ञानिक दोनो तरह के कारण जुड़े हुए होते हैं। इसलिए ही माथे पर लगाया जाता हैं, तिलक

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