इस वैज्ञानिक ने नोबेल प्राइज कमेटी के खिलाफ की बग़ावत, जानियें कारण

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जयपुर। दुनिया में सबसे बड़ा सम्मान माने जाने वाले नोबेल प्राइज है अगर ये किसी को मिल जाता है तो वो बहुत ही गौरव की बात होती है। लेकिन इसकी विश्वसनीयता पर एक भारतीय वैज्ञानिक ने हाल ही में कई सवाल खड़े किए हैं जो इसके खिलाफ है और एक बगावत जैसा ही है। फोटोनिक मटीरियल्‍स रिसर्च लैबोरेटरी, ऑबर्न यूनिवर्सिटी (यूएसए) के निदेशक पद पर कार्यरत प्रोफेसर मृणाल ठाकुर ने रॉयल स्‍वीडिश अकेडमी ऑफ साइंस पर धांधली के आरोप लगाये हैं। प्रो. ठाकुर का कहना है कि नोबेल प्राइज के लिये लोगों का चयन करने में पक्षपात करती है कमेटी। इस बयान के बाद से इस भारतीय वैज्ञानिक ने कमेटी के खिलाफ बग़ावत का ऐलान कर दिया है।

प्रो. ठाकुर ने नोबेल कमेटी पर आरोप लगाते हुये कहा है कि ये कमेटी भारतीयों, एशियाई, अफ्रीकियों और लैटिन अमेरिकी लोगों को नोबेल पुरस्कार देने में पक्षपात करती है। इसके पक्षपात के चलते भारत को इतने कम नोबेल पुरस्कार मिल पाए हैं। इस मामले में प्रो. ठाकुर ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार से भी इस बात की गुज़ारिश की है कि वो इस मामले में निजी हस्‍तक्षेप करे और उनका साथ दे। इसी के साथ ही यह संवेदनशील मुद्दा स्‍वीडन के प्रधानमंत्री स्‍टीफन लोवेन के समक्ष उठाया जायेगा तभी भारतीय वैज्ञानिकों को सही मायने पर सम्मान मिल पाएगा। आपको जानकारी दे कि प्रो. ठाकुर को नोबेल पुरस्‍कार के लिये 2001 से नामित किया जा रहा है।

पिछले वर्ष भी उन्‍हें रसायन विज्ञान श्रेणी में नामित किया गया था। आपको शायद इस बात की जानकारी नहीं होगी कि प्रो. ठाकुर को नॉन कंजूगेटेड कंडक्टिव पॉलीमर्स पर खोज के लिये सारी दुनिया जानती है। लेकिन 2000 के दौरान नोबेल प्राइज में उन्‍हें इस शानदार खोज के लिये कोई सम्मानित नही किया गया था। जबकि कमेटी ने कंडक्टिव पॉलीमर्स के लिये एक दूसरे वैज्ञानिक को नोबेल पुरस्कार दे दिया था। आपको बता दे कि जिस वैज्ञानिक को यह सम्मान दिया गया था, उसका सिद्धांत प्रो ठाकुर ने बहुत पहले ही गलत साबित कर दिया है इसके बावजूद भी ठाकुर को

सम्मानित ना करके उस वैज्ञानिक को नोबल दिया गया। प्रो. ठाकुर के द्वारा दि गई जानकारी को माने तो जब उन्‍होंने उस वैज्ञानिक के सिद्धांतों में कई तरह की गलतियां खोजी थी तो अमेरिकी सरकार ने उन्हें दिये जाने वाले फंड को अचानक से रोक दिया था और 2003 से लेकर अब तक शोधकार्य के लिये उन्हें मिलने वाली राशि अभी तक अटकी हुई है। इसी तरह से 2014 में सुपर रिसॉल्‍व्‍ड फ्लुओरेसेंस माइक्रोस्‍कोपी की खोज की थी जिसके लिये भी उन्‍हें कोई सम्मान नहीं दिया गया।

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