स्वामी विवेकानंद के धर्म के ज्ञान को अगर लोग अब भी समझ लें तो धर्म के नाम पर झगड़ा ना हो

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उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक मत रुको

स्वामि विवेकानंद। एक नाम ऐसा जिसने भारत में ही नहीं, पूरे विश्व में आध्यात्म के ज़रिये अपना लोहा मनवाया। आज हमें योग को बढ़ावा देने के लिए विश्व योग दिवस मनाने की ज़रुरत पड़ रही है। लेकिन आध्यात्म को बढ़ावा देने के लिए विवेकानंद को ऐसा कुछ करने की ज़रुरत नही पड़ी। एक ऐसा युवा जिसे ये पता था कि वो ज़्यादा दिन जीवित नहीं रहेगा, एक ऐसा युवा जो कि आध्यात्मिक था, पर साथ में देश प्रेमी भी था, एक ऐसा युवा जिसे आज के तरह कभी ब्रांडिंग की ज़रुत नहीं पड़ी।

सांप्रदायिकता, कट्टरता, और इसके भयानक वंश, कट्टरपंथियों ने इस सुंदर पृथ्वी को लंबे समय से पकड़ लिया है। उन्होंने पृथ्वी को हिंसा के साथ भर दिया है, ये अक्सर मानव रक्त के साथ भीग गया, इसने  सभ्यता को नष्ट कर दिया और पूरे देश को निराशा में भेज दिया। अगर यह इन भयानक राक्षसों के लिए नहीं था, तो मानव समाज अब और अधिक उन्नत होगा। अगर किसी को यहां उम्मीद है कि यह एकता किसी एक धर्म की जीत और दूसरे के विनाश से आएगी तो मैं कहता हूँ, ‘भाई’, तुम्हारी एक असंभव आशा है।

विवेकानंद हिंदु थे, भगवा पहनते थे, पर कभी धर्म के नाम पर आग नहीं उगली, जैसा कि आजकल लोग करते हैं। उन्होंने सभी धर्मों को समान नज़र से देखा। उन्में एक ऐसा हिंदु बसता था, जो कि आज की नज़र में बिल्कुल अलग है। उनको धर्म प्रचारक कहा जा सकता है पर उनको दूसरे धर्मों का विरोध नहीं कहा जा सकता है। दूसरे धर्म का सम्मान वो कैसे करते थे इस बार में प्रूफ देने की ज़रुरत नहीं है, क्योंकि उनकी कही हुई बातों का अनुसरण आज भी सारे धर्मों के लोग करते हैं।

विवेकानंद की ज़िन्दगी बस 39 साल की है, पर उन्होंने जा कहा वो कई लाग दोबारा जन्म लेकर भी नहीं समझ पाएंगे। जो बात आज धर्म को लेकर लोग करते हैं, जो धर्म को लोगों ने समझ लिया है, वैसा धर्म विवेकानंद की नज़रों में नफरत का धर्म था। धर्म के बारे में सुनकर जिस तरह से लोगों का खून गर्म हो जाता है, वैसा विवेकानंद नहीं चाहते थे। विवेकानंद ने तो शांति के उपदेश दिये। कहा कि सभी धर्मों का अपना एक अलग नज़रिया है।

धार्मिक सहिष्णुता सभी मान्यताओं और धर्मों के लोगों के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। समस्याएं उत्पन्न होती हैं जब अज्ञानी, कट्टरपंथी बड़े लोग दूसरों पर अपनी विश्वव्यापी जानकारी थोपने का प्रयास करते हैं और एक अलग व्यवहार में लिप्त होते हैं। धर्म को ढाल बना कर इस प्रकार का व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए और इसे बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। सभी हितधारकों, खासकर राजनीतिक दलों द्वारा जाति के अवरोधों को दूर करने के लिए निरंतर प्रयासों की आवश्यकता है। जाति, नकदी और समुदाय को चुनावी राजनीति में कोई भूमिका निभाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए और लोगों को उनके लोक प्रतिनिधियों को चरित्र, क्षमता, क्षमता और आचरण के आधार पर चुना जाना चाहिए।

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