संसद के बजट सत्र का अंत, कामकाज न के बराबर, जानिए इसके बारे में !

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संसद के बजट सत्र का शुक्रवार को समापन हो गया। सत्र का दूसरा चरण पूरी तरह हंगामे की भेंट चढ़ गया। सरकार व विपक्ष के बीच गतिरोध लगातार कायम रहा। सत्तापक्ष को अच्छा बहाना मिला, विपक्ष एक पखवाड़े बाद भी अविश्वास प्रस्ताव ला न सका। लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने विभिन्न विपक्षी पार्टियों द्वारा पटल पर रखे गए अविश्वास प्रस्ताव को नहीं लिया। उन्होंने सदन में ‘व्यवधान’ का हवाला दिया और कहा कि वह व्यवधान की वजह से प्रस्ताव का समर्थन करने वाले सदस्यों की गणना करने में सक्षम नहीं हैं।

अविश्वास प्रस्ताव के लिए कम से कम 50 सदस्यों का समर्थन जरूरी होता है। नियम में यह भी कहा गया है एक बार अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस देने के बाद अध्यक्ष को सभी दूसरे कामकाज निलंबित करने होते हैं और प्रस्ताव को सदन पटल पर लाना होता है।

संसद में गतिरोध को लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का खेल जारी रहा। इस दौरान बजट, अनुदान मांगों व वित्त विधेयक को कुछ मिनटों में बिना किसी चर्चा के पारित कर दिया गया।

बजट सत्र का पहला चरण (29 जनवरी से 9 फरवरी तक) उत्पादक रहा, जबकि 5 मार्च से दूसरे चरण में अन्नाद्रमुक (एआईएडीएमके), तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) व वाईएसआर कांग्रेस के सदस्यों के सदन में नारेबाजी, तख्तियां दिखाने व हंगामे के बीच लोकसभा व राज्यसभा को बार-बार स्थगित करना पड़ा।

शुरुआत में कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस व वाम पार्टियों के बैंक धोखाधड़ी, एससी/एसटी अधिनियम के प्रावधानों को ‘हल्का’ करने, कृषि संकट जैसे मुद्दों को लेकर उनकी मांगों के बीच समानता रही, जबकि टीडीपी व वाईएसआर कांग्रेस ने आंध्र प्रदेश के लिए विशेष दर्जा की मांग को लेकर दबाव बनाया व अन्नाद्रमुक सदस्यों ने कावेरी प्रबंधन बोर्ड बनाने की मांग की।

करोड़ों रुपये के बैंकिंग धोखाधड़ी की चर्चा संसद में जिस नियम के तहत होनी थी, वही सरकार व विपक्ष के बीच गतिरोध का कारण था।

पीआरएस के अनुसार, बजट सत्र साल 2000 के बाद सबसे कम उत्पादक रहा है। पीआरएस संसद के कामकाज को ट्रैक करता है।

संसद के दोनों सदनों ने 2000 के बाद से सबसे कम समय चर्चा पर खर्च किया।

इस सत्र में साल 2014 के बाद से सार्वजनिक महत्व के मुद्दों पर सबसे कम संख्या में चर्चा हुई और यह लोकसभा के प्रश्नकाल का सबसे खराब प्रदर्शन रहा। लोकसभा में विधायी कामकाज पर सिर्फ एक फीसदी व राज्यसभा में छह फीसदी उत्पादक समय खर्च किया गया।

पीआरएस विधायी शोध के कार्यक्रम अधिकारी तृणा राय ने आईएएनएस से कहा, “बार-बार व्यवधान के कारण लोकसभा ने अपने तय समय का सिर्फ 22 फीसदी कार्य किया और राज्यसभा ने 27 फीसदी कार्य किया। संसद अपने संवैधानिक दायित्व का पालन करने में सक्षम नहीं रही जो चिंता का विषय है।”

जैसा कि हमेशा से होता आया है, गतिरोध के लिए विपक्ष व सरकार ने एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराया।

लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन व राज्यसभा के सभापति एम. वेकैंया नायडू ने व्यवधान को लेकर अपनी गंभीर चिंता जताई।

सत्र के समापन पर अपनी टिप्पणी में सभापति नायडू ने अफसोस जाहिर करते हुए कहा कि राज्यसभा में जो कामकाज हुआ, उसके बारे में उनके पास बताने के लिए ज्यादा कुछ नहीं है, लेकिन राज्यसभा में जो नहीं हो पाया, उसके बारे में बताने को बहुत कुछ है।

इस सत्र में भारतीय जनता पार्टी राज्यसभा में भी सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी और कई नए सदस्यों ने शपथ ली।

राज्यसभा के उप सभापति पी.जे. कुरियन जुलाई में सेवानिवृत्त हो रहे हैं, अगले सत्र में इस पद के लिए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन व विपक्ष के बीच प्रतिस्पर्धा हो सकती है।

न्यूज स्त्रोत आईएएनएस

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