तारे की मौत के तुरंत बाद ही नहीं बनते है ब्लैक होल, जानिये इसके पीछे का सच

0
38

जयपुर। जैसा कि हम जानते है कि क तारे की मौत के बाद ही ब्लैल का जन्म होता है। लेकिन इस प्रक्रिया में बहुत ही वक्त लगता है। इसको होने में कई करोड़ो साल लग जाते है। आपको बता दे कि जब तारे के भीतर मौजूद हाइड्रोजन तथा अन्य नाभिकीय ईंधन खत्म हो जाता है, तो वह अपने गुरुत्वाकर्षण को संतुलित करने के लिए पर्याप्त ऊष्मा नहीं प्राप्त कर पाता है और इसी स्थिति में तारा ठंडा होने लगता है। जानकारी के लिए बता दे कि वर्ष 1935 में भारतीय खगोलभौतिकविद् सुब्रमण्यन चन्द्रशेखर ने यह स्पष्ट कर दिया कि

अपने ईंधन को समाप्त कर चुके सौर द्रव्यमान से 1.4 गुना द्रव्यमान वाले तारे, जो स्वयं को नही सम्भाल पाता है अपने ही अंदर एक विस्फोट करते है। बता दे कि इस विस्फोट को अधिनवतारा या सुपरनोवा कहते है। विस्फोट के बाद उसके अवशेष न्यूट्रान तारा  बनाते है या श्याम विवर यानी ब्लैक होल बनाते है। लेकिन भारतीय वैज्ञानिक सुब्रमण्यन चन्द्रशेखर बताया कि यह काल-अंतराल मे उत्पन्न विकृति को समझाने के लिये होता है। क्योंकि ब्लैक होल इस आकार के नही होते है। इनका कहना था कि आकाशगंगा में ऐसे बहुत से तारे होते हैं

जिनका द्रव्यमान सौर द्रव्यमान से तीन-चार गुना होता है। जो गुरुत्वीय खिचांव अत्यधिक होने के कारण संकुचित होने लगते हैं, और जिससे दिक्-काल या अंतरिक्ष समय विकृत होने लगता है, इसका मतलब है कि जब तारा किसी निश्चित क्रांतिक सीमा तक संकुचित होकर अपने दिक्-काल को इतना अधिक झुका लेता है कि अदृश्य हो जाता है और यही वे अदृश्य पिंड होते हैं जिसे ब्लैक होल  कहते हैं। जानकारी के लिए बताया कि अमेरिकी भौतिकविद् जॉन व्हीलर ने वर्ष 1967 में पहली बार इन पिंडो के लिए ब्लैक होल शब्द का प्रयोग किया था।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here