अयोध्या मामले पर सुन्नी वक्फ बोर्ड में आई दरार

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अयोध्या मामले में सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से आई अलग-अलग प्रतिक्रियाओं ने इसे एक नया मोड़ दे दिया है। यह देश में सबसे लंबे समय से चले आ रहे भूमि विवादों में से एक है। इसे सुलझाने के लिए 40 दिनों की मैराथन सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों की पीठ ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। वक्फ बोर्ड में दरार सामने आई है। बोर्ड के एक पक्ष ने कहा कि वह मामले में समझौते के लिए तैयार है, जबकि दूसरे पक्ष ने विवादित भूमि पर मालिकाना हक का जमकर समर्थन किया है।

यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह अत्यंत संवेदनशील मामले में गहन सुनवाई के 40 दिनों के बाद हुआ है।

एक तरफ सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील और वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने विवादित भूमि के मालिकाना हक का दावा किया। जबकि दूसरी तरफ वकील शाहिद रिजवी ने कहा कि अयोध्या विवाद में शामिल पक्ष एक निपटारे तक पहुंच चुके हैं, इसलिए इस मुद्दे पर किसी निर्णय की आवश्यकता नहीं होगी।

निर्मोही अखाड़ा ने हालांकि मध्यस्थता के दावों को नकार दिया है। इसके प्रवक्ता कार्तिक चोपड़ा ने कहा कि ऐसा लगता है कि वक्फ बोर्ड में दरार पैदा हो गई है।

उन्होंने हालांकि कहा कि मध्यस्थता पर ताजा रिपोर्ट का मामले पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, क्योंकि अदालत ने पहले ही फैसला सुरक्षित रख लिया है।

हिंदुओं की ओर से एक पक्ष का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील विष्णु शंकर जैन ने भी कहा कि मध्यस्थता पर ताजा रिपोर्ट अंतिम फैसले को प्रभावित नहीं करेगी क्योंकि अदालत ने पहले ही सभी पक्षों को सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया है।

रिजवी ने कहा कि एक बार जब कोई मामला अदालत के सामने आता है, तो इसमें शामिल पक्ष अपने मामले को बेहतरीन तरीके से पेश करने के हकदार हैं। उन्होंने कहा कि अगर अदालत को लगता है कि मामला मध्यस्थता द्वारा सुलझाया जा सकता है, तो यह होना चाहिए और इसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

रिजवी ने कहा कि शीर्ष अदालत ने खुद ही दिलचस्पी दिखाई है कि इसे मध्यस्थता द्वारा सुलझाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि अगर पक्षकारों को लगता है कि दिए गए फैसले से पहले मामले का निपटारा किया जा सकता है, तो पक्ष विवाद का निपटारा कर सकते हैं। यह अदालत पर निर्भर है और इसे मंजूरी दी जा सकती है।

रिजवी ने कहा, “अदालत के बाहर चर्चा करने में कोई रोक नहीं है। विशेष रूप से इस मामले में। वास्तव में अदालत ने इसकी अनुमति दी है।”

2011 में बोर्ड द्वारा दो अपील दायर की गई थीं, जिनमें मुख्य मुकदमा और राम लला मुकदमा शामिल है।

लेकिन, रिजवी के दावे को शीर्ष अदालत में बोर्ड का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील ने अस्वीकार कर दिया और उन्होंने समझौते पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।

शीर्ष अदालत ने इस मुद्दे को सौहार्दपूर्ण ढंग से निपटाने के लिए मार्च में एक मध्यस्थता दल नियुक्त किया था। लेकिन जब यह अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में विफल रहा, तो शीर्ष अदालत सभी पक्षों की दलीलें सुनने के लिए सहमत हो गई।

मामले में छह अगस्त से प्रतिदिन की सुनवाई शुरू हुई और 16 अक्टूबर को शीर्ष अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।

मुस्लिम पक्षकारों के कहने पर सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता के दूसरे दौर का दरवाजा सितंबर के मध्य में खोला।

रामलला और निर्मोही अखाड़ा मध्यस्थता के दूसरे दौर में शामिल नहीं हुए थे।

न्यूज स्त्रोत आईएएनएस


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