सात बार के तैराकी चैम्पियन अरुण कुमार शॉ का निधन

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सात बार के पूर्व राष्ट्रीय तैराकी चैम्पियन अरुण कुमार शॉ का लंबी बिमारी के बाद यहां गुरुवार को निधन हो गया। वह 82 वर्ष के थे। बंगाल एमेच्योर तैराकी संघ ने एक बयान जारी कर शॉ के निधन की पुष्टि की है।

शॉ 1967 में अर्जुन पुरस्कार पाने वाले राज्य के पहले तैराकी थे। उन्होंने 1958 में बंगाल टीम के लिए पहला राष्ट्रीय चैम्पियनशिप खिताब जीता था। इसके बाद वह दक्षिण-पूर्व रेलवे से जुड़ गए थे।

उन्होंने इसके अलावा 1959, 1962, 1964, 1965-67 में राष्ट्रीय चैम्पियनशिप का खिताब जीतकर एक नया राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया था। वह कई वर्षो तक राष्ट्रीय चयनकर्ता भी रहे थे।

बंगाल एमेच्योर तैराकी संघ और भारतीय तैराकी महासंघ ने शॉ के निधन पर शोक व्यक्त किया है और उन्हें अपनी श्रद्धांजलि दी है।

न्यूज स्त्रोत आईएएनएस


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बहुत ही मुश्किल है अपने बारे में लिखना । इसलिए ज्यादा कुछ नहीं, मैं बहुत ही सरल व्यतित्व का व्यक्ति हूं । खुशमिजाज हूं ए इसलिए चेहरे पर हमेशा खुशी रहती हैए और मुझे अकेला रहना ज्यादा पंसद है। मेरा स्वभाव है कि मेरी बजह से किसी का कोई नुकसान नहीं होना चाहिए और ना ही किसी का दिल दुखना चाहिए। चाहे वो व्यक्ति अच्छा हो या बुरा। मेरे इस स्वभाव के कारण कभी कभी मुझे खामियाजा भी भुगतान पड़ता है। मैं अक्सर उनके बारे में सोचकर भुला देता हूं क्योंकि खुश रहने का हुनर सिर्फ मेरे पास है। मेरी अपनी विचारए विचारधारा है जिसे में अभिव्यक्त करता रहता हूं । जिन लोगों के विचारों से कभी प्रभावित भी होता हूं तो उन्हें फोलो कर लेता हूं । अभी सफर की शुरुआत है मैने कंप्यूटर ऑफ माटर्स की डिग्री हासिल की है और इस मीडीया क्षेत्र में अभी नया हूं। मगर मुझे अब इस क्षेत्र में काम करना अच्छा लग रहा है। और फिर इसी में काम करने का मन बना लेना दूसरों के लिये अश्चर्य पूर्ण होगा। लेकिन इससे पहले और आज भी ब्लागर ने एक मंच दिया चिठ्ठा के रुप में, जहां बिना रोक टोक के आसानी से सबकुछ लिखा या बताया जा सका। कभी कभी मन में उठ रही बातों या भावों को शब्दों में पिरोयाए उनमें खुद की और दूसरों की कहानी कही। कभी उनके द्वारा किसी को पुकाराए तो कभी खुद ही रूठ गया। कई बार लिखने पर भी मन सतुष्ट नहीं हुआ और निरंतर कुछ नया लिखने मन बनता रहता है। अजीब सी बेचैनी जो न जाने क्या करवाएगी और कितना कुछ कर गुजर जाने की तमन्ना लिए निकले हैं इन सफरों, जहां उम्मीद और विश्वास दोनों कायम हैं जो अर्जुन के भांति लक्ष्य को भेद देंगे । मुझे अभी अपने जीवन में बहुत कुछ करना है किसी के सपनों को पूरा करना हैं । अब तो बस मेरा एक ही लक्ष्य हैं कि मैं बस उसके सपने पूरें करू।

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