जानिए क्या हैं विवाह में देरी का कारण….

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हिंदू धर्म में शादी विवाह के होने से व्यक्ति लड़का और लड़की की जन्मकुंडली देखी जाती हैं, जन्मकुंडली के आधार पर ही लड़का और लड़की का शुभ विवाह होता हैं वही जन्मकुंडल का प्रत्येक भाव का अपना अलग अलग और विशिष्ट महत्व होता हैं मगर सप्तम भाव जन्मांग का केंद्रवर्ती भाव हैं। वही आपको बता दें,कि जिसके एक तरफ शत्रु भाव और दूसरी तरफ मृत्यु भाव स्थित होता हैं। वही व्यक्ति के जीवन के दो निर्मम सत्यों के मध्य यह रागानुराग वाला भाव सदैव जाग्रत और सक्रिय रहता हैं।

वही इस भाव से जीवन साथी ,शादी विवाह, यौना चरण और संपत्ति का विचार करना चाहिए। सप्तम भावस्थ यानी कि शनि के फल: आमयेन बल हीनतां गतो हीनवृत्रिजनचित्त संस्थितिः। कामिनीभवनधान्यदुःखितः कामिनीभवनगे शनैश्चरै।। इसका अर्थ यह हैं,कि सप्तम भाव में शनि हो तो व्यक्ति आपरोग से निर्बल, नीचवृत्ति, निम्न लोगो की संगति पत्नी व धान्य से दुखी रहता हैं। वही मनुष्य के शादी विवाह जैसे कार्यों में शनि की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। यहआकाश मंडल के नवग्रहों में शनि बहुत मंदगति से घूमता यानी की भ्रमण करने वाला ग्रह माना जाता हैं। वही आपको बता दें,कि सप्तम भाव में शनि बहुत ही बली होता हैं। ​मगर सिद्धांत व अनुभव के मुताबिक केंद्रस्थ क्रूर ग्रह अशुभ फल व्यक्ति के जीवन में प्रदान करता हैं। वही ऐसे में व्यक्ति का जीवन बहुत ही रहस्यमय हो जाता हैं हजारों जनम पत्रियों के अध्ययन, चिंतन से यह बात सामने आती हैं कि सप्तम भावस्थ शनि के प्रभाव से कन्या का विवाह आयु के 32 वें साल से 39 साल के बीच में हो सकता हैं।

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