राहुल गांधी के सहारे क्या कांग्रेस एक भी चुनाव जीत पाएगी?

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जयपुर। कांग्रेस एक और विधानसभा चुनाव हार चुकी है। भले ही वो सरकार बनाने के लिए कर्नाटक में हाथ-पांव मार रही हो, लेकिन उसे अब ये स्वीकार कर लेना चाहिये कि भाजपा ने उसका एक और किला ध्वस्त कर दिया है और वो भी ऐसा किला जहां के सारे क्षेत्रों पर वो अपना अधिकार जमा लेने की दावा कर रही हो।

कांग्रेस के अध्यक्ष बनने के बाद राहुल गांधी का ये पहला विधानसभा चुनाव था। हालांकि 2014 के बाद से जितने भी लोकसभा चुनाव हुए, सारे चुनावों में राहुल गांधी ने ही कांग्रेस पार्टी के लिए सामने से लीड किया और पंजाब को छोड़कर कांग्रेस को सारे राज्यों में हार का सामना करना पड़ा।

राहुल गांधी लगातार हार रहे हैं और कांग्रेस का कार्यकर्ता से लेकर नेता तक उनके ऊपर से हार का ज़िम्मा लेने को हटा रहा है। ना राहुल ने हार को माना और ना ही किसी कांग्रेसी ने उनकी रणनीति पर ही सवनाल उठाया। ये सवाल तो सोचने लायक है कि जिस पार्टी का अध्यक्ष हार को स्वीकार नहीं कर लेना चाहता है और जिस पार्टी के बाकी नेता अपने अध्यक्ष को हार का ज़िम्मेदार नहीं मानते, वो पार्टी आगे के चुनाव कैसे जीत लेने का दावा कर सकती है।

कर्नाटक कांग्रेस का मज़बूत गढ़ था, मगर कांग्रेस यहां पर दो नंबर पर सिमट गई। कर्नाटक के बाद अब इस साल के अंत तक कांग्रेस के सामने तीन विधानसभा चुनाव हैं और तीन के तीनों विधानसभा चुनावों में भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर होने जा रही है। इन तीनों राज्यों में भाजपा की सरकार है और ऐसा कहा जा रहा है कि जनता भाजपा की सरकारों से खुश नहीं है।

ऐसा तो फिर कर्नाटक में भी कहा जा रहा था कि जनता मोदी सरकार से खुश नहीं है, इसलिए वो मोदीजी के खिलाफ ही वोट डालेंगे, पर ऐसा हुआ नहीं है।

दरअसल अब राज्यों के चुनाव राज्य स्तर पर नहीं राष्ट्रीय स्तर पर लड़े जा रहे हैं। कर्नाटक में सिद्धारमैया के काम को जनता ने काफी पसंद किया था, लेकिन कांग्रेस फिर भी हार गई। इसका मतलब साफ हुआ कि कर्नाटक ने वोट मोदी और राहुल के चेहरे को देखते हुए किया।

अब आते हैं मोदी और राहुल पर। 3 मई से पहले जब मोदी ने कर्नाटक में चुनाव प्रचार नहीं किया था, तब तक यही लग रहा था कि भाजपा कांग्रेस से हारने वाली है, लेकिन मोदी के राज्य में आते ही पासा पलट आ गया और सबका ध्यान मोदी की तरफ हो गया।

दूसरी तरफ राहुल गांधी 12 फरवरी से ही राज्य में चुनाव प्रचार में लग गए थे। एक के बाद एक कई सारी छोटी मोटी रैलियां की। मोदी के चुनाव प्रचार में आते ही राहुल गांधी के तेवर ढीले लगने लगे। जनता से लेकर मीडिया तक सबकी नज़रें मोदी पर ही टिक गईं। इस वजह से ये फिर से कहा जा रहा है कि राहुल गांधी ही क्यों?

अध्यक्ष तो वहीं रहेंगे, लेकिन संगठन में और भी बड़े नेताओं की ज़रुरत है, जिसके तेवर का इस्तेमाल करके विरोधियों पर निशाना लगाया जाए। अगर कांग्रेस सिर्फ राहुल गांधी से ही उम्मीद लेकर बैठी है तो उसे ये भी समझ लेना चाहिये कि वो खुद ही कांग्रेस मुक्त भारत की ओर आगे बढ़ रही है।

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