पहली बार सामने आया सच आखिर क्यों औरतों पर बनी हैं सबसे ज्यादा गालियां, मर्दों को लेकर क्यों नहीं.. जानिए

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दुनियां में चाहे कोई कितना ही सभ्य क्यों ना हो कभी ना कभी उसके मुंह से गाली निकल ही जाती है। आदमी, औरत, बच्चे—बूढ़े और विद्वान—मूर्ख, साधु महात्मा, नेता—अभिनेता यानि धरती की कोई जाति या धर्म का इंसान हो सब लोग गालियां देते हैं।

लेकिन गालियो में एक बात जो ध्यान देने वाली है वो ये है कि सबसे ज्यादा गालिया औरतों को लेकर ही बनी है। चाहे देशों को बंटवारो हो गया हो, हमारी संस्कृतियां बदल हो चुकी हो लेकिन क्या औरतों को लेकर दी जाने वाली गालियां बदलीं।

चलिए गालियों को लेकर हम इसके विस्तार में जाते हैं। इतिहासकार सुसन ब्राउनमिलर ने ‘Against Our Will: Men, Women And Rape’नाम की एक किताब लिखी है। जिसमें ब्राउनमिलर ने रेप को प्रागैतिहासिक से जोड़ते हुए लिखा है कि पशु कभी बलात्कार नहीं करता है।

लेकिन इंसानों में मर्दों के रेप की क्षमता ​शरीर विज्ञान से जुड़ी हुई। इंसानों की शारीरिक बनावट कुछ ऐसी है कि मौजूदा स्थितियों में दोनों के यौन अंग आपस में एक खास तरीके से जुड़ जाते हैं। प्रागैतिहासिक काल में मर्दों ने रेप के साथ ही आगे बढ़े बाद में जाकर बुद्धिजीवी बनने पर बलात्कार को वो अपराध मानने के लिए तैयार हुए। शायद यहीं से गालियों की शुरूआत हुई। गाली के माध्यम से हम सामने वाले का अपमान करते हैं, अपना गुस्सा निकालते हैं या​ फिर मजाक उड़ाते हैं।

गालियां अक्सर मर्दों के अपमान को केंद्र में रखकर बनी हैं। ऐसा करने के लिए औरतों शरीर या फिर जानवरों की उपमाओं का इस्तेमाल किया जाता है। किसी के साथ युद्ध हो फिर सांप्रदायिक दंगे सबसे पहले महिलाओं के शरीर को ही केंद्र में रखकर सामने वाले को निशाना बनाया जाता है।

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चाहे बहन के नाम गाली हो या​ फिर मां के नाम इसका कोई यूरोपीय संस्करण है हीं नहीं। क्यों कि मां के नाम से गाली वहां भी है। अक्सर जो मां के नाम गाली का पहला शब्द निकालते हैं वो मादर है जो एक फारसी शब्द है। जैसे मादर—ए—हिंद, मादर—ए—वतन आ​दि।

आपने कभी ध्यान दिया है कि हमारे किसी भी प्राचीन ग्रंथ या फिर महाकाव्यों में गाली के एक शब्द नहीं मिलते। महाभारत में इतनी मारकाट के बाद किसी ने किसी को गाली ना दी हो ऐसा हो ही नहीं सकता। ग्रीक ग्रंथों जैसे होमर, इलियड और ओडिसी में भी गाली नहीं मिलती है।

कालिदास अपने ग्रंथों में नायिका के मादक अंगों का वर्णन करते हैं लेकिन गाली कहीं नहीं मिलती। भारतीय साहित्य में अगर कहीं भली बुरी गालियां देखने को मिलती हैं तो वो अक्सर दलित जातियों और औरतों को लेकर मिलती है। हरामी एक अरबी भाषा का शब्द है लेकिन अब ये उतना ही भारतीय भी हो चुका है। संस्कृत साहित्य में  दास्यपुत्र, गुरूपत्नी गामिनी आदि शब्द मिलते हैं लेकिन इनका चित्रण गाली के रूप में कहीं भी देखने को नहीं मिलता है।

आमतौर पर मां—बहन से जुड़ियों गालियों को ही सबसे बुरी गाली माना जाता है। लिंग से जुड़ी गालियां लगभग हर जगह पाई जाती है।

बंगाल में आपने किसी को चूतिया कह दिया तो पिटाई हो सकती है। असम इसी नाम की एक जन​जाति भी है। असम में इस समुदाय में चूतिया का अर्थ वैभव होता है। बंगाल में सुरेरे बाच्चा कहने पर बहुत अपमानजनक माना जाता है।एशिया के सभी देशों में मां—बहन के साथ यौन संबंधों को लेकर दी जाने वाली गाली सबसे बुरी गाली मानी जाती है।

आजकल कुछ राजनीतिक गालियां भी ईजाद हो चुकी हैं जैसे ‘कांग्रेसी’ या ‘चड्ढीवाला’ आदि।  सोशल मीडिया पर भी ‘सिकुलर’, ‘आपटार्ड’ और वामपंथियों के लिए ‘पेटी बुर्जुआ’ शब्द आजकल गाली के रूप में खूब प्रचलन में है।

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