भक्ती में अंधभक्ती को न जोडें, मोक्ष का मार्ग कर्मों से है न कि आत्महत्या से

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जयपुर। दिल्ली के बुरारी संत नगर में एक परिवार के 11 लोगों की सामूहिक आत्महत्या का केस आज कल सभी लोगों के जुबान पर है। ये सामूहिक आत्महत्या वाला केस अंधभक्ती में लिया गया एक कदम है। जिसमें परिवार के सभी सदस्य आस्था के नाम पर अंधे हो कर मोक्ष की प्राप्ती के लिए बगैर सोचे समझे ये कदम उठाया।

इस सब के बीच क्या आपने कभी ये सोचने की कोशिश की है कि आत्महत्या करने से कौन से मोक्ष की प्राप्ती होती है। इस तरह मोक्ष प्राप्ति का मार्ग तो हमारे शास्त्रों में कही नहीं लिखा गया है। न ही किसी श्रृषिमुनि से कभी मोक्ष का यह मार्ग सुझाया।

हमारे पुराणों, शास्त्रों में मोक्ष प्राप्ति का मार्ग तो हमारे किये सदकर्मों से जोड़ा है, हम अपने जीवनकाल में अगर अच्छे कर्म करते है किसी का बुरा नहीं करते अपने जीवन को सही नियम और संयम से जीते हैं तो मृत्यु के बाद मोक्ष की प्राप्ती होती है।

हिन्दू धर्म में आत्महत्या को पाप माना गया है, हर किसी व्यक्ति को अपने भाग्य में लिखवाएं दिन और कष्ट दोनों को भोगना ही पड़ता है।  इस संबंध में हिंदू धर्म के गरुड़ पुराण में बताया गया है कि आत्महत्या करना किसी तरह से मोक्ष मोक्ष नहीं दिला सकता है। वैसे गीता में श्रीकृष्ण ने भी मोक्ष प्राप्ति के लिए साधना करने का ही ज्ञान दिया है ना कि आत्मघात का।

 

हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, आत्महत्या करने के बाद आत्मा भूत-प्रेत की कई योनियों में भटकती है। इसे साथ ही अगर कोई अपनी किसी अधूरी इच्छा को लेकर मरा है तो उसे पूरा करने के लिए व्यक्ति को फिर से जन्म लेना पढता है। इसके साथ ही जो अपनी आयु को पूरा किये बगैर प्राण त्याग करते हैं ऐसे लोगों की आत्मा भटकती रहती है इनको किसी भी प्रकार मोक्ष की प्राप्ती नहीं होती।

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इसलिए हमारे शास्त्र भी हमे जीवन को जीन सिखाते है किस्मत में लिखे कष्टों को इस जीवन में ही भोगना बताते हैं, जिससे आने वाले जन्म सार्थक हो सके। हमारे किसी भी ग्रन्थ या शास्त्र में मोक्ष का मार्ग आत्महत्या नहीं बताया है। अपने धर्म के प्रति अपने ईश्वर के भक्ती विश्वास अच्छी भावना है, लेकिन ये भक्ति भावना कभी अन्ध भक्ती या अन्ध विश्वास नही होना चाहिए। वैसे भी हम बाजार से सब्जी लेने भी जाते है तो सभी ओर से मोल भाव कर ही खरीदते है तो फिर अगर कोई आस्था के नाम पर ऐसे राह पर लेकर जा रहा है तो एक बार अन्ध भक्ती को छोड कर सोचना विचार करना जरुरी है।

इसलिए हम आपको यही सलाह देगें आस्था जितनी जरूरी है उससे कही ज्यादा जरूरी है अन्धभक्ती से अपने को बचाना। अगर कोई आस्था के नाम पर कुछ भी करने को बोलो तो एक बार सोच विचार कर लें अगर तब भी कुछ समझ न आए तो अपने पुराणिक ग्रन्थों को गीता रामायण को खोल कर देख ले जीवन जीने का सार उसमें मिल जाएगा।

 

 

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