गंगा दशहरा 2020: मां गंगा की कैसे हुई उत्पत्ति और क्या है इसका धार्मिक महत्व, जानिए

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आपको बता दें कि इस साल एक जून को गंगा दशहरा का त्योहार मनाया जाएगा। इस दिन साधक गंगा नदी में आस्था की डुबकी लगाते हैं धार्मिक ग्रंथों में लिखा है। कि गंगा दशहरा के दिन गंगा माता धरा पर अवतरि​त हुई हैं। इस दिन पितरों को तर्पण करने से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती हैं। चिरकाल में राजा भगीरथ ने अपने पितरों को भी इस दिन मोक्ष दिलाया था। तो आज हम आपको मां गंगा के अवतरण की पूर्ण कथा के बारे में बताने जा रहे हैं तो आइए जानते हैं।

पौराणिक कथा के मुताबिक चिरकाल में इक्ष्वाकु वंश के राजा सगर की दो पत्नियां थी मगर दोनों निसंतान थी। इसके बाद राजा सगर ने ब्रह्मा जी की कठिन तपस्या की, जिससे ब्रह्मा जी ने प्रसन्न होकर सगर को दो वरदान दिया। इसमें एक वरदान से 60 हजार अभिमानी पुत्र और दूसरे से वंश वृद्धि के लिए संतान की प्राप्ति हुई मगर इंद्र उन बच्चों को कपिल मुनि के आश्रम में छोड़ ​आए। जब राजा सगर अपने बच्चों को ढूंढते हुए कपिल मुनि के आश्रम पहुंचे तो उन्हें अपने बच्चे दिखे। जब वह लेने पहुंचे तो उनके इस कार्य से कपिल मुनि की तपस्या भंग हो गई इसके बाद कपिल मुनि के शात से सभी बच्चे जलकर राख हो गए। उस समय राजा सगर न ब्रह्मा जी का आह्वान कर उपाय बताने को कहा। तब ब्रह्मा जी ने कहा कि इन्हें मोक्ष दिलाने के लिए गंगा को पृथ्वी पर लाना होगा। वही कालांतर में राजा सगर ने कठिन तपस्या की मगर गंगा को लाने में असफल हुए। इसके बाद राजा भगीरथ ने गंगा माता की कठिन तपस्या की। तब जाकर गंगा माता ने जलधारा की वेग को रोकने का उपाय ढूंढ़ने को कहा। फिर भगीरथ ने शिव की तपरूा की। इससे गंगा के पृथ्वी पर आने का मार्ग मिला। शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में स्थान दिया।

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