आइए जाने, आस्था और अंधविश्वास में क्या फर्क है

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kanya-poojan on durgashtami and navami

आस्था व्यक्ति को सबल बनाती है,और अंधविश्वास व्यक्ति को कमजोर बना देता है, आस्था एक साधारण मनुष्य को आत्मविश्वास प्रदान करती है, व्यक्ति को अपने देश,समाज,और परिवार की ओर आस्था होना परम आवश्यक हैं, और एक साधारण मनुष्य को आत्म बल बनाये रखने के लिए ईश्वर आदि में आस्था रखना परम आवश्यक हैं।

आस्था को किसी हद तक की सीमा में बांधा जा सकता है,लेकिन अंधविश्वास कि कोई सीमा नही होती है,आस्था और अंधविश्वास ने पूरे संसार को अपने वश मे कर रखा है,और देशो की तुलना से हमारे देश मे अंधविश्वास अधिक है, जितना अंधविश्वास हमारे सभ्य कहे जाने वाले समाज में है उतना ही असभ्य कहे जाने वाले समाज में है,जितना गाँवो में है उतना ही शहरो में हैं, जिस प्रकार शहरो मे किसी भी कार्य को प्रारम्भ करने से पहले सभी देवी -देवता के अगरबत्तिया लगाई जाती है उसी प्रकार गाँवो मे किसी को एक छींक भी आ जाये तो उसे अशुभ माना जाता है, अत:  अंधविश्वास को एक पराकाष्ठा की उपमा दी जाती है, माना जाता है कि हमारे देश की गुलामी का मुख्य घटक अंधविश्वास ही था । जिस की वजह अंग्रेजो ने फूट डालकर राज करने की नीति अपना रखी थी।

भ्रष्टाचार का भी अंधविश्वातस के साथ गहरा संबंध है, क्योंकि आज कल लोग मंदिरो मे करोडो रुपये इसलिए चढाते है,कि उनकी मनोकामना पूर्ण हो।  कहने का मतलब यह हुआ कि पहले देवी-देवताओं को लालच दो फिर अपनी इच्छा के अनुसार काम करवाना।

अत: हमें अंधविश्वास को कम करके हमारी संस्कृति को बचाना चाहिए,क्योंकि इन अंधविश्वासो ने हमारी संस्कृति नष्ट की सम्भावना बढ रही हैं।

 

 

 

 

 

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