इन्द्र ने बनवाया भगवान शिव का यह मंदिर, यहां नित्य आकर करते हैं शिव दर्शन

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जयपुर। देवता, असुर और मनुष्य सभी भगवान भोलेभंडारी की पूजा कर इनको प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं। ऐसे में हिन्दू धर्म में भगवान शिव को लेकर गहरी आस्था लोगो के मन में हैं। ऐसे में हिन्दू धर्म के अनुयासी अपने जीवनकाल में कोशिश करते हैं बारह ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने से के, और जो इनके दर्शन कर लेता है उसे जीवन में मोक्ष मिल जाता है।

ऐसे में आज हम इस लेख में केदारनाथ मंदिर के बारे में जानकारी दें रहे हैं। भगवान शिव सम्पूर्ण संसार के कल्याण की कामना से हिमालय के केदार क्षेत्र में केदारनाथ के रूप में विराजमान है। यहा के लिए माना जाता है सत्ययुग में उपमन्युजी  ने यहीं भगवान शंकर की आराधना की थी। द्वापर में पाण्डवों ने यहां तपस्या कर दु:खों से मुक्ति पाई। पाडवों के प्रार्थना करने पर भगवान शिव नीचे की ओर मुख कर वहां स्थित हो गये। केदारनाथ में कोई मूर्ति नहीं है। पांच मुखों से युक्त बहुत बड़ा तिकोना पर्वत खण्ड है।

स्कन्दपुराण के अनुसार प्राचीन समय में स्वायम्भुव मन्वन्तर  में हिरण्याक्ष नाम का एक महाबली और महातेजस्वी दैत्य था। उसने अपने तप के बल से इन्द्र को स्वर्ग से निकाल दिया और त्रिलोकी पर अपना अधिकार जमा लिया। देवताओं के साथ इन्द्र गंगोत्री में आकर तप करने लगे। एक दिन इन्द्र के तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव महिष का रूप धारण कर इन्द्र के पास आये और कहा- ‘के दारयामि ?’ अर्थात्-‘मैं इस रूप (महिष रूप) में सभी दैत्यों में से किस-किस को जल में विदीर्ण कर डालूं ?’

इन्द्र ने कहा- ‘प्रभु! आप हिरण्याक्ष, सुबाहु, वक्त्रकन्धर, त्रिश्रृंग और लोहिताक्ष-इन पांच दैत्यों का वध कर दीजिए क्योंकि इनके मरने पर और दैत्य स्वयं ही मृत के समान हो जायेंगे।’ भगवान शिव ने महिष रूप में अपने सींगों के वार से एक ही बार में हिरण्याक्ष सहित पांचों दैत्यों का वध कर दिया । इसके बाद भगवान शिव ने इन्द्र के पास आकर कहा-‘मैंने पांचों दैत्यों का वध कर दिया है, अब तुम पुन: त्रिलोकी का राज्य करो और मुझसे कोई दूसरा वर मांगना चाहो तो मांग लो ।’

इन्द्र ने कहा-‘भगवन्! आप त्रिलोकी की रक्षा, कल्याण और धर्म-स्थापना के लिए इसी रूप में यहां निवास कीजिये।’  भगवान शिव ने कहा-‘यह रूप तो मैंने दैत्यों के वध के लिए रखा था लेकिन तुम्हारी इच्छा के अनुसार अब मैं इसी रूप में यहां निवास करुंगा।’

ऐसा कहकर भगवान शिव ने एक सुन्दर कुण्ड प्रकट किया जो दूध के समान स्वच्छ जल से भरा हुआ था । भगवान शिव बोले-‘जो कोई भी मेरा दर्शन करके इस कुण्ड का दर्शन करेगा तथा दायें-बायें दोनों हाथों की अंजलि से तीन बार इस कुण्ड का जल पीयेगा, वह तीन कुल के पितरों को तार देगा । महिषरूपधारी भगवान शंकर के विभिन्न अंग पांच स्थानों में प्रतिष्ठित हुए जो ‘पंच केदार’ माने जाते हैं। जिसके बाद इन्द्र ने कहा-‘भगवन्! मैं प्रतिदिन स्वर्ग से यहां आकर आपकी पूजा करुंगा और इस कुण्ड का जल भी पीऊंगा। आपने महिष के रूप में यहां आकर ‘के दारयामि’ कहा है, इसलिए आप केदार नाम से प्रसिद्ध होंगे ।’

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