इस धाम में भगवान शिव बैल की पीठ की आकृति में विराजते हैं, जाने इसका कारण

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जयपुर। उत्तराखण्ड में स्थित केदारनाथ धाम हिमालय की गोद में बसा भगवान शिव का धाम है। केदारनाथ धाम 12 ज्योतिर्लिंग में के एक माना जाता है, इसके साथ ही इसे चार धाम और पंच केदार में से एक माना जाता है। केदारनाथ में स्वयम्भू शिवलिंग जो प्राचीन है इसके दर्शन के लिए शिव पुराण में कहा गया है कि जो भक्त केदारनाथ आता हैं,  उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है और पापों से मुक्ति मिलती है।

12 ज्योतिर्लिंग में के एक माना जाने वाला केदारनाथ मंदिर समुद्रतल से 3553 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। आज के दौर में यह सभी के लिए आश्चर्य का विषय है कि इतनी ऊंचाई पर मंदिर का निर्माण कैसे हुआ। लेकिन केदारनाथ के लिए माना जाता है कि इस मंदिर की स्थापना आदिगुरु शंकराचार्य ने की है।

हिमालय के केदार श्रृंग पर भगवान विष्णु के अवतार महातपस्वी नर और नारायण ऋषि तपस्या करते थे। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा इस स्थान पर वास करने का वरदान दिया। कहा जाता है कि महाभारत युद्ध के बाद पांडव विजयी होने के बाद भ्रातृहत्या के पाप से मुक्ति के लिए व भगवान शिव का आशीर्वाद पाना चाहते थे लेकिन भगवान शिव उनसे रुष्ट थे।

भगवान शिव के दर्शन के लिए जब पांडव काशी गए लेकिन वे उन्हें वहां नहीं मिले। उनको खोजते हुए हिमालय आ पहुंचे। लेकिन भगवान शिव, पांडवों को दर्शन नहीं देना चाहते थे,  इसलिए वे यहां से अंतरध्यान होकर केदार में जा बसे। शिव की खोज में पांडव भी केदार जा पहुंचे। ऐसे में भगवान शिव ने बैल का रूप धारण कर लिया और अन्य पशुओं में जा मिले। पांडवों को संदेह हो गया तो भीम ने विशाल रूप धारण कर दो पहाड़ों पर पैर फैला दिया। सब गाय-बैल तो निकल गए पर भगवान शिव पैर के नीचे से जाने को तैयार नहीं हुए। भीम ने बैल की पीठ का भाग पकड़ लिया। भगवान शिव, पांडवों की भक्ति देखकर प्रसन्न हो गए। उन्होंने दर्शन देकर पांडवों को पाप मुक्त कर दिया। उसी समय से भगवान शिव बैल की पीठ की आकृति पिंड के रूप में श्री केदारनाथ में पूजे जाते हैं। पशुपतिनाथ मंदिर में बैल के अगले और केदारनाथ में पिछले हिस्से की पूजा की जाती है।

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