पहले भाजपा-जेडीएस ने मिलकर कांग्रेस को रोका और अब जेडीएस-कांग्रेस मिलकर भाजपा को रोकेंगे?

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जयपुर। कर्नाटक का विधानसभा चुनाव शायद इतिहास बनाने के जैसा है। इस विधानसभा चुनाव में जनता ने जिस तरह का संदेश दिया है, उससे ये तो साफ है कि सरकार बनाने के लिए कई तरह के दांव-पेंच खेलने होंगे और वो खेल चल भी रहा है।

लेकिन इस दांव-पेंच के खेल में जनता दल सेक्युलर ही जीतती हुई देखी जा रही है। जेडीएस ने खुद को किंग बनाने के लिए जो बिसात बिछाई वो भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए हानिकारक साबित हो गई। इसे ये भी कहा जा सकता है कि भाजपा-कांग्रेस जेडीएस के फेंके गए चारे और उसके बाद फेंके गए जाल में फंस गए। तभी तो तीसरे नंबर होने की पार्टी होने के बावजूद जेडीएस के अध्यक्ष कुमारस्वामी सीएम की दौर में सबसे आगे चल रहे हैं।

15 मई को आए विधानसभा चुनाव के नतीजों को देखें तो किसी को भी जेडीएस की चाल आसानी से समझ में आ जानी चाहिये। ओल्ड मैसूर क्षेत्र का ही उदाहरण लेते हैं और समझने की कोशिश करते हैं कि किस तरह से जेडीएस ने पहले कांग्रेस का खेल बिगाड़ा और अब जाकर भाजपा का खेल बिगाड़ने में लगी है।

साल 2013 की बात की जाए तो तब विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने ओल्ड मैसूर क्षेत्र में एकतरफा जीत हासिल की थी। इस क्षेत्र में कांग्रेस ने 40 सीट हासिल की थी और 2013 के विधानसभा चुनाव में उसे 41 सीट हासिल की थी। 2013 के विधानसभा चुनाव में जेडीएस ने 30 सीट हासिल की थी, जबकि भाजपा को महज़ 5 सीटें ही हासिल हुई थीं।

 

ओल्ड मैसूर क्षेत्र में इस बार के चुनाव में ये साफ तौर पर कहा गया कि कांग्रेस को घेरने के लिए भाजपा-जेडीएस ने भीतरी रूप से हाथ मिला लिया था। तभी तो कांग्रेस इस बार के चुनाव में क्षेत्र में महज़ 17 सीटों पर ही सिमट गई। भाजपा को 9 और जेडीएस को सबसे ज़्यादा 28 सीटों पर जीत हासिल हुई। इस तरह से जेडीएस ने जो चालें चलीं उसमें कांग्रेस फंस गई।

अब जब राज्य में हंग असेंबली का नतीजा आया है, तो भाजपा को रोकने के लिए कांग्रेस ने बिना शर्त के जेडीएस को समर्थन देने का फैसला कर लिया है। इस तरह से जेडीएस का चुनाव से पहले ये दावा कि वो किंग मेकर नहीं बल्कि किंग है, सही साबित होता हुआ दिख रहा है।

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