कर्नाटकः बहुमत हासिल करने का समय घट कर 72 घंटे हो सकता है?

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जयपुर। कर्नाटक में विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद तीन दिन गुज़र चुके हैं। सीएम के रूप में भाजपा के बीएस येदियुरप्पा ने शपथ भी ले लिया है, लेकिन शायद उनको भी यकीन नहीं है कि वो सीएम बनने के बाद भी सीएम हैं या नहीं, क्योंकि बहुमत हासिल करने के लिए उन्हें विधानसभा का रुख करना होगा और अभी ये साफ नहीं है कि बहुमत के लिए वो ज़रुरी 8 विधायकों का समर्थन कहां से लाएंगे।

16 और 17 मई की मध्य रात्रि सुप्रीम कोर्ट के तीन जज जस्टिस ए के सीकरी , जस्टिस एस के बोबडे और जस्टिस अशोक भूषण ने ये फैसला दिया था कि वो येदियुरप्पा के शपथ को रोक नहीं सकते हैं। इन सबके बीच सबसे बड़ी बात ये रही थी कि सुप्रीम कोर्ट के इन तीन जजों ने ना ही शपथ को रोका और ना ही उन्होंने कांग्रेस की याचिका को ही रद्द किया।

आज सुप्रीम कोर्ट फिर से इस याचिका के ऊपर सुनवाई करने वाली है। राज्यपाल वजुभाई वाला ने भाजपा को बहुमत साबित करने के लिए 15 दिनों का समय दिया है, जिसपर कांग्रेस ने विरोध किया था और उनकी याचिका में ये भी शामिल है।

सुप्रीम कोर्ट अब 15 दिन के अल्टिमेटम को 48 घंटे का कर सकता है, लेकिन बीच में शनिवार और रविवार होने की वजह से ये 48 घंटे से 72 घंटे हो सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ऐसा कर सकता है, इसका प्रूफ ये है कि इससे पहले भी झारखंड और गोवा में सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत हासिल करने के अल्टिमेटम को कम कर दिया था।

2005 में भाजपा को सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद राज्यपाल ने झामूमो और कांग्रेस को सरकार बनाने दिया था। भाजपा के पास 36 सीटें थीं, जबकि कांग्रेस-झामूमो गठबंधन के पास मात्र 26 सीटें थीं। राज्यपाल ने 19 दिनों का समय बहुमत साबित करने के लिए दिया था। भाजपा सुप्रीम कोर्ट गई और कोर्ट ने इसे 48 घंटे का कर दिया। शिबू सोरेन बहुमत साबित ना कर पाए और बाद में भाजपा की सरकार ने बहुमत हासिल कर लिया।

इसके बाद पिछले साल गोवा में ऐसा हुआ। कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी थी, पर राज्यपाल ने भाजपा को सरकार बनाने का न्योता दिया और बहुमत साबित करने के लिए 15 दिन का समय दिया। कांग्रेस सुप्रीम कोर्ट गई और फिर कोर्ट ने इसे 48 घंटे का कर दिया। लेकिन भाजपा ने बहुमत साबित कर दिया।

अब कर्नाटक का समय है। कर्नाटक में राजनीति का नाटक हो रहा है और ये सबके सामने ही हो रहा है। कोई राज्यपाल पर उंगली उठा रहा है तो कोई संविधान की धज्जियां उड़ गईं हैं, ऐसा कह रहा है। जनता मूक दर्शक बन कर बैठी है। ऐसा लग रहा है कि टेनिस का मैच चल रहा है। दो पार्टियां खेल रही हैं। जनता की नज़र कभी इस पाले पर है तो कभी उस पाले पर। हां, कभी कभी गेंद जनता के पास जाती है तो वो वापस दोनों में से किसी एक को दे देती है। मैच फिक्स भी हो सकता है।

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