कालभैरव, जिनसे काल भी होता है भयभीत, पढ़ें पूरी कथा

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हिंदू धर्म में काल भैरव अष्टमी को विशेष महत्व दिया जाता हैं। वही भगवान शिव की क्रोधाग्नि का विग्रह रूप माने जाने वाले कालभैरव का प्राकटय पर्व मार्गशीर्ष माह कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाया जाता हैं। वही इस दिन मध्याह्न में शिव के अंश से भैरव की उत्पत्ति हुई थी। जिन्हें शिव का पांचवां अवतार माना जाता हैं। इनके दो रूप हैं पहला बटुक भैरव जो भक्तों को अभय देने वले सौम्य रूप में प्रसिद्ध हैं। तो वहीं काल भैरव आपराधिक प्रवृतियों पर नियंत्रण करने वाले भयंकर दंडनायक हैं। इनकी शक्ति का नाम हैं भैरवी गिरिजा, जो अपने उपासकों की अभीष्ट दायिनी हैं।

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बता दें कि इनकी पूजा से घर में नकारात्मक शक्ति, जादू टोने और भूत प्रेत आदि से किसी भी प्रकार का भय नहीं रहता हैं। वही शिव पुराण में कहा गया हैं कि ”भैरवः पूर्णरूपोहि शंकरस्य परात्मनः। मूढास्तेवै न जानन्ति मोहितारूशिवमायया।” अर्थ— भैरव परमात्मा शंकर के ही रूप हैं। मगर अज्ञानी मनुष्य शिव की माया से ही मोहित रहते हैं।

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वही नंदीश्वर भी कहते हैं कि जो शिव भक्त शंकर के भैरव रूप की पूजा रोजाना करता हैं उसके जन्मों जन्म में किए हुए पाप नष्ट हो जाते हैं। इनके स्मरण और दर्शन मात्र से ही प्राणी निर्मल हो जाता हैं। इनके भक्तों का अनिष्ट करने वालों को किसी भी लोक में शरण नहीं मिलता हैं।

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वही काल भी इनसे भयभीत रहता हैं। इसलिए इन्हें काल भैरव और हाथ में त्रिशूल, तलवार और डंडा होने के कारण इन्हें दंडपाणि भी कहा जाता हैं। भैरव को प्रसनन करने के लिए उड़द की दाल या इससे निर्मित मिष्ठान, दूध मेवा का भोग लगाया जाता हैं। वही चमेली का पुष्प इनको अतिप्रिय हैं। कालिका पुराण के मुताबिक भैरव जी का वाहन श्वान हैं। इसलिए विशेष रूप से इस दिन काले कुत्ते को मीठी चीजें खिलाना बड़ा ही शुभ माना जाता हैं।

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