झारखंड : आईएएस अधिकारी ने कोरोना की जंग में तकनीक को बनाया हथियार

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ऐसे तो इस कोरोना संक्रमण काल में सभी अधिकारी अपनी क्षमता के मुताबिक कोरोना से जंग लड़ रहे हैं। इस लड़ाई में झारखंड में एक ऐसे भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) अधिकारी भी हैं जो अपने कायोंर्ं के अलावे अपनी इंजीनियरिंग के ज्ञान का भी उपयोग इस जंग में कर रहे हैं, जिसका लाभ आम लोगों से लेकर विभाग तक को हो रहा है।

वर्ष 2015 बैच के अधिकारी आदित्य रंजन पश्चिम सिंहभूम में उप विकास आयुक्त (डीडीसी) के पद पर रहते अपने इंजीनियरिंग के तकनीकी ज्ञान की बदौलत नवाचार से कई उपयोगी सामानों को विकसित किया जो आज कोरोना की जंग में मदद कर रहे हैं।

झारखंड के पश्चिम सिंहभूम के जिला मुख्यालय चाईबासा के सदर अस्पताल में कोरोना संक्रमण की जांच के लिए अनोखे ‘कोविड-19 सैंपल कलेक्शन सेंटर’ की स्थापना की गई है। यह केबिननुमा केंद्र ना केवल सुरक्षित है बल्कि सस्ता भी है।

डीडीसी आदित्य रंजन ने अपने अन्य इंजीनियर मित्रों की मदद से इस तकनीक को अपने घर पर ही विकसित किया और फिर परीक्षण के बाद इसे सदर अस्पताल परिसर में स्थापित किया गया। डीडीसी का दावा है कि यह देश का पहला इस तरह का केन्द्र है। एल्युमीनियम शीट से तैयार किया गया यह बूथ पूरी तरह ‘एयर टाइट’ है, यानि इसमें हवा अंदर-बाहर नहीं जा सकती। स्वास्थ्यकर्मी इसके अंदर बैठकर ग्लब्स पहनकर कोरोना से संदिग्ध मरीज का सैंपल ले सकेंगे।

आदित्य रंजन ने बीआईटी मेसरा से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है। बोकारो में जन्मे और एक सरकारी स्कूल से प्राथमिक शिक्षा ग्रहण करने वाले रंजन ने बताया कि पीपीई किट की कमी के कारण मन में कुछ नया करने का विचार आया। इसके बाद इंटरनेट पर विदेशों के कुछ अस्पतालों की वीडियो क्लीपिंग और फोटो देखने के बाद उन्हें यह बूथ बनाने का आइडिया आया।

रंजन बीआईटी मेसरा से इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद बेंगलुरू में दो साल नौकरी की और फिर यूपीएससी की परीक्षा दी। आदित्य सरकारी अधिकारी की ड्यूटी के अलावा भी इनोवेटिव आइडिया के जरिए लोगों की भी मदद पहुंचा रहे हैं। डीडीसी आदित्य रंजन ने कोरोना संक्रमण से बचने के लिए फेस शील्ड का डिजायन तैयार किया और स्वास्थ्यकर्मियों और पुलिसकर्मियों के लिए स्वयं सहायता समूह की महिलाओं द्वारा इस फेस शील्ड का निर्माण प्रारंभ करवाया।

नवाचारों के लिए चर्चित आदित्य रंजन ने कोविड-19 से लड़ाई में अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हुए देश का पहला रोबोटिक्स उपकरण को-बोट को तैयार किया। इसके अलावे उन्होंने हाईटेक आइसोलेशन बेड भी तैयार किया। हाईटेक इंडिविजुअल आइसोलेशन बेड अपने आप में एक कमरे के समान है, जिससे किसी चिकित्साकर्मी को मरीज से और मरीजों को एक दूसरे से संक्रमण से बच रहे हैं।

डीडीसी ने बैंकों में नोट, चेक और ड्राट को विसंक्रमित (वायरस के संक्रमण से मुक्त) करने की मशीन भी विकसित की है। इससे बैंक कर्मियों और रेलकर्मियों की सुरक्षा हो रही है।

पश्चिम सिंहभूम के उपायुक्त अरवा राजकमल ने यह मशीन चाईबासा के बैंक ऑफ इंडिया की मुख्य शाखा को सौंपी है। डीडीसी द्वारा बनाए गए इस मशीन को दक्षिण पूर्व रेलवे मुख्यालय चक्रधरपुर रेलवे स्टेशन के टिकट काउंटर पर भी उपलब्ध करवाया गया है।

डीडीसी आदित्य रंजन ने आईएएनएस को बताया कि इस मशीन को बनाने में 3 हजार से 3500 रुपये खर्च आए हैं।

बहरहाल, आदित्य रंजन अपने सरकारी कार्यो के अलावे अपने इंजीनियरिंग ज्ञान के जरिए नवाचारों से कोरोना की जंग में अपनी अहम भूमिका निभा रहे हैं।

न्यूज स्त्रोत आईएएनएस

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बहुत ही मुश्किल है अपने बारे में लिखना । इसलिए ज्यादा कुछ नहीं, मैं बहुत ही सरल व्यतित्व का व्यक्ति हूं । खुशमिजाज हूं ए इसलिए चेहरे पर हमेशा खुशी रहती हैए और मुझे अकेला रहना ज्यादा पंसद है। मेरा स्वभाव है कि मेरी बजह से किसी का कोई नुकसान नहीं होना चाहिए और ना ही किसी का दिल दुखना चाहिए। चाहे वो व्यक्ति अच्छा हो या बुरा। मेरे इस स्वभाव के कारण कभी कभी मुझे खामियाजा भी भुगतान पड़ता है। मैं अक्सर उनके बारे में सोचकर भुला देता हूं क्योंकि खुश रहने का हुनर सिर्फ मेरे पास है। मेरी अपनी विचारए विचारधारा है जिसे में अभिव्यक्त करता रहता हूं । जिन लोगों के विचारों से कभी प्रभावित भी होता हूं तो उन्हें फोलो कर लेता हूं । अभी सफर की शुरुआत है मैने कंप्यूटर ऑफ माटर्स की डिग्री हासिल की है और इस मीडीया क्षेत्र में अभी नया हूं। मगर मुझे अब इस क्षेत्र में काम करना अच्छा लग रहा है। और फिर इसी में काम करने का मन बना लेना दूसरों के लिये अश्चर्य पूर्ण होगा। लेकिन इससे पहले और आज भी ब्लागर ने एक मंच दिया चिठ्ठा के रुप में, जहां बिना रोक टोक के आसानी से सबकुछ लिखा या बताया जा सका। कभी कभी मन में उठ रही बातों या भावों को शब्दों में पिरोयाए उनमें खुद की और दूसरों की कहानी कही। कभी उनके द्वारा किसी को पुकाराए तो कभी खुद ही रूठ गया। कई बार लिखने पर भी मन सतुष्ट नहीं हुआ और निरंतर कुछ नया लिखने मन बनता रहता है। अजीब सी बेचैनी जो न जाने क्या करवाएगी और कितना कुछ कर गुजर जाने की तमन्ना लिए निकले हैं इन सफरों, जहां उम्मीद और विश्वास दोनों कायम हैं जो अर्जुन के भांति लक्ष्य को भेद देंगे । मुझे अभी अपने जीवन में बहुत कुछ करना है किसी के सपनों को पूरा करना हैं । अब तो बस मेरा एक ही लक्ष्य हैं कि मैं बस उसके सपने पूरें करू।

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