आईएमए, दीपिका की संस्था ने ‘मेंटल है क्या’ की आलोचना की

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इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) और अभिनेत्री दीपिका पादुकोण की संस्था द लिव लव लाफ फाउंडेशन (टीएलएलएलएफ) ने शनिवार को कंगना रनौत और राजकुमार राव अभिनीति फिल्म ‘मेंटल है क्या?’ के पोस्टर की आलोचना की।

आईएमए के साथ इंडियन साइकियाट्रिक सोसाइटी (आईपीएस) ने फिल्म निर्माताओं से अपील की है कि फिल्म के शीर्षक को बदले तथा ट्रेलर को वापस लें।

आईएमए ने कहा कि टाइटल में जो ‘मेंटल’ नामक शब्द है और जो कहने का अंदाज है, वह मानसिक रोग की परेशानियां झेल रहे लोगों की हंसी उड़ाता है और उनका अपमान करता है।

आईएमए के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. शांतनु सेन का कहना है कि कई शोध बताते हैं कि भारत सहित दुनिया के सारे देश मानसिक रोगों से जुड़े कलंक (स्टिग्मा) से आज भी जूझ रहे हैं। विशेषज्ञ लोगों को लगातार समझा रहे कि दुनिया में कोई मेंटल या पागल नहीं। वे सब किसी न किसी रोग से ग्रस्त हैं और यह न अपराध है न अभिशाप। इन रोगों का इलाज संभव है। कुछ बीमारियां क्रॉनिक होती हैं जो कि नियमित दवाओं और अन्य प्रकार की देखभाल से नियंत्रित रहती हैं।

इंडियन साइकियाट्रिक सोसाइटी के अध्यक्ष डॉ.मृगेश वैष्णव का कहना है, “मानव-अधिकारों के प्रति सजगता के इस दौर में मानसिक रूप से परेशान लोगों के अधिकारों की भी रक्षा होनी चाहिए। अब तो हम पूरे व्यक्ति को बीमार बताने वाले टर्म ‘मानसिक रोगी’ की जगह ‘मानसिक रोग से ग्रस्त व्यक्ति’ कहने लगे हैं, क्योंकि मनोरोग व्यक्ति को पूरी तरह खारिज नहीं करते। मगर इस फिल्म का टाइटल व्यक्ति को पूरी तरह खारिज करता है- यह अनैतिक और अमानवीय ही नहीं अवैधानिक भी है।”

वैष्णव ने कहा, “फिल्म निर्माता ने हाल ही में एक पोस्टर रिलीज किया है। उसमें नायक और नायिका आमने-सामने बैठकर अपनी सटी हुई जीभों के ऊपर एक नंगे ब्लेड को संतुलित करते दिखते हैं। कमाल की कल्पना है। मगर क्या यह रचनात्मक भी है? इसकी कौन-सी उपयोगिता है? सच्चाई तो यह है कि यह एक खतरनाक खेल खेलने की प्रवृत्ति का उदाहरण है। आज भारत में उद्दंडता (डिलिंक्वन्सी) और स्वयं को खतरों में नाहक डालने वाले व्यक्तित्व रोगों की वृद्धि हो रही है। नशाखोरी, जानलेवा सेल्फी लेना, तेज ड्राइविंग आदि इसके उदाहरण हैं। ऐसे में कुछ खतरनाक करने को उकसाता यह पोस्टर एक अपराध है। इसे रचनात्मक तो कतई नहीं माना जा सकता।”

इंडियन मेडिकल असोसिएशन तथा इंडियन साइकाएट्रिक सोसाइटी ने कहा कि हम सूचना और प्रसारण मंत्रालय से निवेदन करते हैं कि वह इस मामले में हस्तक्षेप करे। हम सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टीफिकेशन से आग्रह करते हैं कि इस अपमानजनक टाइटल पर रोक लगाए और अगर इस फिल्म में मानसिक स्वास्थ्य के ²ष्टिकोण से कुछ भी आपत्तिजनक है तो उसे हटाने या परिवर्तित करने का आदेश दे।

वहीं, टीएलएलएफ के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से ट्वीट किया गया, “अब मानसिक बीमारी से परेशान लोगों के लिए उनके खिलाफ रूढ़ियों को मजबूत करने वाले अपमानजनक शब्दों, चित्रों के उपयोग को बंद करने का समय आ गया है।”

फिल्म की अभिनेत्री कंगना रनौत की बहन रंगोली चंदेल ने इसका जवाब देते हुए कहा, “रनौत को तीन राष्ट्रीय पुरस्कार मिले हैं और वो भारत में महिला आन्दोलन को आगे बढ़ाने वाली प्रमुख ताकत है। वे इतनी परिपक्व हैं कि अपनी जिम्मेदारी समझ सके। हम फिल्म की कहानी उजागर नहीं कर सकते, लेकिन हमने फिल्म को प्रदर्शित करने के लिए सभी जरूरी मंजूरियां जुटाई हैं।”

उन्होंने गुजारिश की कि ‘करणी सेना’ ना बनें (जिसने दीपिका की फिल्म ‘पद्मावत’ के खिलाफ प्रदर्शन किया था) और फिल्म को रिलीज होने दें।

न्यूज स्त्रोत आईएएनएस


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बहुत ही मुश्किल है अपने बारे में लिखना । इसलिए ज्यादा कुछ नहीं, मैं बहुत ही सरल व्यतित्व का व्यक्ति हूं । खुशमिजाज हूं ए इसलिए चेहरे पर हमेशा खुशी रहती हैए और मुझे अकेला रहना ज्यादा पंसद है। मेरा स्वभाव है कि मेरी बजह से किसी का कोई नुकसान नहीं होना चाहिए और ना ही किसी का दिल दुखना चाहिए। चाहे वो व्यक्ति अच्छा हो या बुरा। मेरे इस स्वभाव के कारण कभी कभी मुझे खामियाजा भी भुगतान पड़ता है। मैं अक्सर उनके बारे में सोचकर भुला देता हूं क्योंकि खुश रहने का हुनर सिर्फ मेरे पास है। मेरी अपनी विचारए विचारधारा है जिसे में अभिव्यक्त करता रहता हूं । जिन लोगों के विचारों से कभी प्रभावित भी होता हूं तो उन्हें फोलो कर लेता हूं । अभी सफर की शुरुआत है मैने कंप्यूटर ऑफ माटर्स की डिग्री हासिल की है और इस मीडीया क्षेत्र में अभी नया हूं। मगर मुझे अब इस क्षेत्र में काम करना अच्छा लग रहा है। और फिर इसी में काम करने का मन बना लेना दूसरों के लिये अश्चर्य पूर्ण होगा। लेकिन इससे पहले और आज भी ब्लागर ने एक मंच दिया चिठ्ठा के रुप में, जहां बिना रोक टोक के आसानी से सबकुछ लिखा या बताया जा सका। कभी कभी मन में उठ रही बातों या भावों को शब्दों में पिरोयाए उनमें खुद की और दूसरों की कहानी कही। कभी उनके द्वारा किसी को पुकाराए तो कभी खुद ही रूठ गया। कई बार लिखने पर भी मन सतुष्ट नहीं हुआ और निरंतर कुछ नया लिखने मन बनता रहता है। अजीब सी बेचैनी जो न जाने क्या करवाएगी और कितना कुछ कर गुजर जाने की तमन्ना लिए निकले हैं इन सफरों, जहां उम्मीद और विश्वास दोनों कायम हैं जो अर्जुन के भांति लक्ष्य को भेद देंगे । मुझे अभी अपने जीवन में बहुत कुछ करना है किसी के सपनों को पूरा करना हैं । अब तो बस मेरा एक ही लक्ष्य हैं कि मैं बस उसके सपने पूरें करू।

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