गूगल के लिए न्यूरोलॉजिकल रिस्पांस नहीं हुआ है विकसित

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जयपुर। गूगल ने हमारे जानकारीयों के स्तर को बढ़ाया है और साथ ही अटैंशन स्पैन को प्रभावित किया है। लेकिन इसके बारे में वैज्ञानिक  कुछ ठोस ढंग से तो नहीं कहते है, क्योंकि गूगल को हमारी जिंदगियों में आए हुए अभी काफी वक्त नहीं बीता है और यहीं कारण है कि इस मामले में अब तक कोई न्यूरोलॉजिकल रिस्पांस विकसित नहीं हुआ है। कुछ विशेषज्ञ बताते है कि न्यूरोफिजियोलॉजिकल स्तर पर अटैंशन स्पैन वैसा ही है जैसा हमेशा से रहा है। विज्ञानिकों को ऐसा भी नहीं लगता कि लोग अब किसी चीज पर वैसे ध्यान केंद्रित नहीं करते जैसे कि पहले करते थे।

इस चीज़ को हम भी मानते है कि इंसान का मस्तिष्क उत्तेजना और सुखद गतिविधियों के मामले में

 नई चीजों और जानकारियों को हमेशा ही प्राथमिकता देता है। और जब आप कोई एक चीज़ गूगल पर सर्च करते है तो वौ आपके सामने कई तरह की और उससे जुड़ा जानकारीयां रखता है तो जाहिर है लोग सामने पड़ी चीज को देखने के बजाय उससे बेहतर चीज देखने की कोशिश करेंगें और ऐसा होना स्वभावीक है। हम सब इस बात से तो सहमत है कि इंसानी मस्तिष्क बेहतर ढंग से सूचनाओं की प्रोसेसिंग कर उन्हें फिल्टर करना जानता है।

हमारा विवेक ही मस्तिष्क को बहुत जानकारियां दे देता है। आपको बात दे कि मस्तिष्क ने ऐसी सूचनाओं को फिल्टर कर इन्हें महत्ता देने का तंत्र विकसित कर लिया है। गूगल भी अपने मस्तिक जैसा ही है लेकिन अंतर ये है कि यहां मिलने वाली जानकारी संक्षिप्त में होती है। मस्तिष्क का सूचनाओं को प्रोसेस करने का तरीका हमेशा आदर्श नहीं माना जा सकता है। इसका कारण है कि जिस प्रक्रिया से हम सूचनाओं की प्राथमिकता तय करते हैं वह भी मस्तिष्क में होती है। जो समझती है कि हम क्या सोचते हैं, किस पर विश्वास करते हैं, किसकी अनदेखी करते हैं।

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