जब लगा कि अब नहीं बन पाएगी ‘पीहू’: विनोद कापड़ी

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हाल ही में रिलीज हुई फिल्म पीहू के ट्रेलर ने हर किसी को हिला कर रख दिया। जिस किसी ने भी इसके ट्रेलर को ​देखा वो हैरत में पड़ गया। इतना ही नहीं फिल्म के ट्रेलर ने तो इंटरनेट की दुनिया में खलबली मचा दी थी। फिल्म को रिलीज होने में अब महज कुछ ही दिन बाकी रह गए हैं। इससे पहले हम आपको फिल्म से जुड़ी कुछ बातें बताने जा रहे हैं। फिल्म की कुछ दिलचस्प बातें इसके डायरेक्टर विनोद कापड़ी ने हिन्दुस्तान से बातचीत में बताया है।

कहानी और पीहू दोनों मिल चुकी थी। प्रोड्यूसर मिलना बाकी था। एक और बेहद मुश्किल काम। मुंबई में अलग-अलग स्टूडियोज और प्रोड्यूसर से मिलना-बात करना शुरू किया। जो जवाब मिलते थे, वो कुछ इस तरह के थे। ‘अरे नहीं विनोद… ये सब्जेक्ट ठीक नहीं है, स्टार के बिना फिल्म को कौन देखेगा? आइडिया तो यूनीक है पर सिर्फ आइडिया यूनिक होने से ही फिल्म नहीं बन जाती, दो साल की बच्ची एक्टिंग कैसे करेगी? असंभव! एक किरदार और वो भी दो साल की बच्ची के साथ फिल्म बनना असंभव है।’

कैसे आया फिल्म का आइडिया
और फिर आई एक ऐसी टिपप्णी जिसने मुझे बहुत कुछ सोचने को मजबूर किया। एक स्टूडियो ने कहा कि, ‘मान लो कि आप ने फिल्म बना भी ली लेकिन एक दो साल की अकेली बच्ची के साथ 100 मिनट या दो घंटे की जो ये फिल्म बनेगी, वो बहुत बोरिंग होगी… इतनी देर तक कोई भी फिल्मकार एक किरदार के साथ दर्शकों की फिल्म में रूचि बना कर कैसे रख सकता है?’

पीहू की उम्र की चिंता
मुझे यकीन था कि पीहू की कहानी पूरे 100 मिनट तक दर्शकों को बांध के रख सकती है, लेकिन मेरे यकीन पर यक़ीन करने को कोई भी तैयार नहीं था। मेरी दूसरी चिंता ये थी कि हर दिन गुजरने के साथ पीहू बड़ी होती जा रही थी। वो अब दो साल और तीन महीने की हो चुकी थी और किसी भी सूरत में पीहू की उम्र ढाई साल होने से पहले मैं इस फिल्म की शूटिंग कर लेना चाहता था। उसकी एकमात्र वजह ये थी कि ढाई-तीन साल की उम्र के बाद बच्चों में कुछ समझ आने लगती है, वो उतने मासूम नहीं रहते जितने डेढ़ दो साल की उम्र में होते हैं। मुझे बहुत खूब एहसास था कि पीहू अगर ढाई साल से ऊपर हो गई तो फिर उसके साथ ये फिल्म नहीं हो सकती है।

चाहिए थे 90 लाख…
मुझे फिल्म के लिये सिर्फ 90 लाख रूपए चाहिए थे। लेकिन मेरे ऊपर या इस कहानी के ऊपर ये दांव खेलने को कोई तैयार नहीं था। प्रोड्यूसर ढूंढने की कोशिश में एक महीना और निकल गया। पीहू अब दो साल चार महीने की हो चुकी थी। ऐसे में एक दिन मैंने अपने CA दोस्त किशन कुमार से बात की। किशन पहले भी दो फिल्मों में हाथ जला चुके थे। किशन को कहानी बहुत पसंद आई और उन्होंने दो दिन का वक्त मांगा। दो दिन का इंतजार दो सदियों के इंतजार से कम नहीं था। कभी-कभी ये ख्याल भी आता था कि पीहू फिल्म बनाने का सपना कहीं सिर्फ सपना ही ना रह जाए क्योंकि मुझे एहसास था कि इस पीहू के अलावा शायद ये फिल्म मैं किसी के साथ कभी ना बना पाऊं। आखिरकार किशन का ​फोन आया और उन्होंने बताया कि वो फिल्म तो करना चाहते हैं लेकिन फिलहाल उनके पास 46 लाख रूपए की ही व्यवस्था हो पा रही है और वो भी दो तीन हफ्ते बाद। मैंने पूछा कि तीन हफ्ते बाद तो हो जाएगी ना? किशन ने पूरा भरोसा दिलाया।

शुरू हुई पीहू की शूटिंग
बस फिर क्या था। शूटिंग की तैयारी शुरू कर दी गई। अनूप दास, DOP योगेश जानी, आर्ट डायरेक्टर असीम चक्रवर्ती, साउंड डिजाइनर सुभाष साहू सबसे बात की और सबको बताया फिल्म के बजट के बारे में… इन सबने अपनी अपनी फीस 50% से 70% तक घटा दी और कहा कि, कुछ भी हो-ये फिल्म बननी चाहिए। मिस टनकपुर में एसोसिएट डायरेक्टर रह चुके अम्बुज को फिल्म की शूटिंग के बारे में पता चला तो उसने मुझे फोन करके नाराजगी जाहिर की कि आपने मुझे बुलाया क्यों नहीं? मैंने उसे बताया कि बजट बहुत ही कम है, इसलिए हम बहुत ही छोटी टीम के साथ फिल्म कर रहे हैं। अम्बुज का जवाब मैं कभी नहीं भूल सकता। उसने कहा कि भले ही मुझे एक भी पैसा ना मिले पर ये फिल्म मुझे करनी ही करनी है। आप मुझे बस शूटिंग की तारीख बताइए, मैं हर हाल में आऊंगा… पूरी टीम को पहले दिन से कहानी पर बहुत विश्वास था… कई मौकों पर तो मुझ से भी ज्यादा… जब ऐसी टीम हो और किशन जैसा दोस्त हो तो छोटी सी पीहू को अब आगे बढ़ने से कौन रोक सकता था?

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