क्या विज्ञान और पुरातत्वविद सुलझा पाए गिज़ा पिरामिड का रहस्य?

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दुनियाभर के कई देशों में ऐसे नायाब अजूबे मौजूद हैं, जिनके निर्माण या उसके पीछे की कहानियां एक रहस्य बनकर ही रह गई हैं। दरअसल, इनमें से कुछ को सभ्यता और संस्कृति से जोडा जाता है तो कुछ इमारतों और जगहों की मौजूदगी को सिर्फ कल्पना के साथ ही जोडा जा सकता है। कुछ इसी प्राकर के अजूबों में शामिल है  मिश्र का गिजा पिरामिड जिसको लेकर आधुनिक समय के वैज्ञानिक और शोधकर्ता अपनी अच्छी-खासी रुचि व्यक्त करते हैं, लेकिन आज तक असल तथ्य कोई प्रस्तुत नहीं कर पाया है।

जानकारी के लिए बता दें कि, कुछ पुरातत्वविदों ने गिजा पिरामिड की बनावट के पीछे का रहस्य सुलझाने के लिए वैज्ञानिक मापदंडों का प्रयोग किया है। जिसमें सामने आने वाले परिणाम आश्चर्यजनक हैं। दरअसल, पुरपातत्वविदों का कहना है कि, यह सच में अकल्पनीय है कि, किस प्रकार प्राचीन मिस्र में गिजा पिरामिड के कोनों को सही अंकों के साथ गठबंधन किया गया था। लेकिन हाल ही में, प्राचीन सभ्यता और इसमें रुचि लेने वाले एक इलेक्ट्रिकल इंजीनियर का मानना है कि इस रहस्य को बेहतर तरीके से सुलझाया जा सकता है।

जाहिर है कि, ग्लेन डैश नामक एक शौकिया पुरातत्वविद् के इस शोध को प्राचीन जर्नल ऑफ मिस्र के आर्किटेक्चर से संबंधित एक पेपर में प्रकाशित किया है जिसमें, इस इंजीनियरिंग ने गिजा पिरामिड की बनावट को प्राचीन उपलब्धि करार देते हुए, प्रभावशाली ढंग से प्रदर्शित किया है। गिजा पिरामिड की बनावट को लेकर इस इंजानियर ने बताया है कि, गिजा पिरामिड के निर्मामाधीन प्राचीन मिस्रियों ने कंम्पास के चार बिंदुओं को शीर्ष बनाकर शरद ऋतु विषुव के साथ अनुमान लगाया होगा, इसी के परिमामस्वरूप आज भी पृथ्वी के भूमध्य रेखा से लगते हुए सूर्य पिरामिड के शीर्ष केंद्र से होकर गुजरता है।

इस शोध में वैज्ञानिक सिद्दांतो की मदद से बताया गया है कि, ग्रेट पिरामिड का मापदंड कार्डिनल मार्गरेखा से मात्र 0.067 डिग्री उलटी की दिशा में, सर्दियों के दौरान नियमित अंतरालों पर छाया की स्थिति को ट्रैक करके हासिल किया जा सकता था। हालांकि इस सिद्धांत को साबित करने के लिए डैश ने प्रयोगात्मक रूप से एक लंबी शंकु के आकार की छड़ी का प्रयोग किया है जो असल में एक स्ट्रिंग का एक टुकड़ा है। उन्होंने मार्गरेखा पर इस छडी को जमीन पर टिकाया और छाया की स्वरूप को चिह्नित करके उस पर गोलाई में नंबरों को अंकित किया।

हालांकि, डैश ने अपने इस शोध को पोम्ब्रेट और कनेक्टिकट में भी आयोजित किया, जिसमें सामने परिणामों को लेकर कुछ इंजीनियर्स का मानना है कि, मिश्र के प्राचीन कारीगरों को गिजा पिरामिड का निर्माण साफ और सूरज के उजाले में करना चाहिए था। इतना ही नहीं, उनका तर्क है कि, मिस्रियों ने फिरौन खुफू के प्रतिष्ठित पिरामिड को बनाने के लिए किसी अलग तकनीक का प्रयोग किया होगा, क्योंकि अगर वैज्ञानिक मापदंडों के हिसाब से तुलना की जाए तो 4,500 वर्ष पुरानी इस स्मारक और इसकी मार्ग रेखा में छोटी-मोटी गलतियां तराशी जा सकती हैं।

इंजीनियर डैश ने अपने इस पेपर के माध्यम से कई संभावित रहस्यों का खुलासा किया है, जिसमें बताया गया है कि, किस प्रकार गिजा पिरामिड की बनावट को आकर्षण और स्पष्टीकरम प्रदान किया है। इस दौरान डैश ने कहा है कि,” दुर्भाग्य से, मिश्र की इन नायाब बनावट में भी अभी-भी कई रहस्य अनसुलझे रह गए हैं।” इसके अलावा उन्होंने यह भी कहा है कि, “इस इमारत को लेकर कोई इंजीनियरिंग दस्तावेज और वास्तुशिल्प योजना नहीं मिल पाई है, जो इसकी बनावट में प्रयोग की गई तकनीक के बारे में स्पषटीकरण दे पाए कि, कैसे प्राचीन मिस्रियों ने अपने किसी भी मंदिर या पिरामिड को गठबंधन किया।”

Image result for The secret of the Giza pyramid resolved with the help of scientific parameters!

मिश्र की प्राचीन सभ्यता और नायाब इमारत को लेकर कुछ पुरातत्वविदों का दावा है कि, मिस्रियों ने इसकी बनावच के लिए ध्रुव तारा का इस्तेमाल किया होगा, तो वहीं दूसरे शोधकर्ता इसके तार सूरज और मौसम से जोडते हैं। लेकिन गिजा पिरामिड को लेकर कोई पुखता सबूत सामने नहीं आ पाए हैं।

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