पंजाब में कपास का रकबा 22 फीसदी बढ़ा, हरियाणा में कम

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पंजाब में बीते दो साल से कपास की खेती को लेकर सरकार की ओर से मिल रहे प्रोत्साहन से इस साल कपास का रकबा पिछले साल के मुकाबले 22 फीसदी से ज्यादा बढ़ गया है। हालांकि हरियाणा में पिछले साल के मुकाबले थोड़ा कम है। खास बात यह है कि भारत समेत वैश्विक बाजार में इस साल कॉटन यानी रूई के दाम में भारी गिरावट के बावजूद कपास की खेती के प्रति देश के किसानों की दिलचस्पी कम नहीं हुई है।

पंजाब में जहां पिछले साल अब तक कपास की बुवाई 3.92 लाख हेक्टेयर में हुई थी वहां इस साल 4.80 लाख हेक्टेयर यानी पिछले साल से 22.44 फीसदी ज्यादा रकबे में कपास की बुवाई हो चुकी है। पंजाब के कृषि विभाग के निदेशक एस.के. ऐरी ने आईएएनएस को बताया कि कपास का रकबा पांच लाख हेक्टेयर करने का लक्ष्य है, हालांकि बुवाई अब मुश्किल से एक सप्ताह और चलने वाली है।

कृषि निदेशक ने बताया कि बीते दो साल से प्रदेश सरकार धान के बदले मक्का व कपास जैसी कम पानी की जरूरत वाली फसलों की खेती को बढ़ावा दे रही है और इस प्रयास के कारण दो साल पहले जहां कपास का रकबा राज्य में 2.62 लाख हेक्टेयर था वहां अब बढ़कर 4.80 लाख हेक्टेयर हो गया है।

हरियाणा में कपास का रकबा करीब 7.14 लाख हेक्टेयर हो चुका है जबकि पिछले साल इसी अवधि में करीब 7.23 लाख हेक्टेयर था। इस प्रकार हरियाणा में कपास का रकबा पिछले साल से थोड़ा कम है जबकि प्रदेश सरकार धान के बदले कपास की खेती करने वाले किसानों का प्रति एकड़ 7000 रुपये देती है।

हरियाणा के कृषि विभाग के अधिकारी आर. पी. सिहाग ने बताया कि हरियाणा में कपास के अलावा, मक्का, दलहन व दूसरी फसल लगाने में भी किसान दिलचस्पी ले रहे हैं।

पंजाब और हरियाणा उत्तर भारत के प्रमुख कपास उत्पादक राज्य हैं और दोनों प्रांतों की सरकार ज्यादा पानी की जरूरत होने वाली फसलों के बजाय कम पानी की जरूरत वाली फसलों की खेती के प्रति किसानों को प्रोत्साहन दे रही है, जिनमें कपास किसानों की पसंदीदा नकदी फसल है।

जानकार बताते हैं कि कपास ही ऐसी नकदी फसल है जिसका व्यापक स्तर पर सरकारी खरीद होती है जिससे ज्यादातर किसानों को सरकार द्वारा तय न्यूनतम समर्थन मूल्य मिल जाता है।

कॉटन बाजार के जानकार मुंबई के गिरीश काबरा ने बताया चालू कॉटन सीजन 2019-20 (अक्टूबर-सितंबर) में भारतीय कपास निगम (सीसीआई) ने करीब एक करोड़ गांठ (एक गांठ में 170 किलो) कपास की खरीद की है जोकि कुल उत्पादन का तकरीब एक तिहाई है।

बेंचमार्क गुजरात शंकर-6 कॉटन का भाव एक साल पहले जहां 45500 रुपये प्रति कैंडी ( एक कैंडी में 356 किलो) था वहां इस समय 33800 रुपये प्रति कैंडी है। इस प्रकार पिछले साल के मुकाबले इस साल कॉटन का भाव 11700 रुपये प्रति कैंडी कम है वहीं अंतर्राष्ट्रीय वायदा बाजार इंटरकांटिनेंटल एक्सचेंज पर इस समय कॉटन के सबसे सक्रिय सौदों में पिछले साल के मुकाबले भाव करीब 10 सेंट प्रति पौंड कम चल रहा है। इस समय आईसीई पर कॉटन का भाव करीब 60 सेंट प्रति पौंड है।

कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सीएआई) के अनुसार, इस साल देश में 330 लाख गांठ कॉटन का उत्पादन होने का अनुमान है जबकि ओपनिंग स्टॉक 32 लाख गांठ, आयात 15 लाख गांठ मिलाकर कुल सप्लाई 377 लाख गांठ रहने का अनुमान है। कोरोना काल में घरेलू मिलें बंद होने से घरेलू खपत महज 280 लाख गांठ जबकि निर्यात 47 लाख गांठ और सरप्लस 97 लाख गांठ और क्लोजिंग स्टॉक 50 लाख गांठ रहने का अनुमान है।

न्यूज स्त्रोत आईएएनएस

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