चीन द्वारा किया गया भारत के सैटेलाइट कम्युनिकेशन पर खतरनाक हमला:अमेरिकी रिपोर्ट CASI

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भारत और चीन के बीच लद्दाख स्थित एलएसी पर पिछले पांच महीने से तनाव जारी है।
इस बीच एक अमेरिकी संस्थान की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि चीनी हैकर्स 2007 से ही भारत के सैटेलाइट कम्युनिकेशन नेटवर्क पर हमला करने की कोशिश में जुटे हैं।
हालांकि, यह कोई पहली बार नहीं है इससे पहले भी चीन पर कई बार आरोप लग चुका है कि उसने हैकिंग के जरिए भारत की अहम खुफिया जानकारी चुराने की कोशिश की।

स्थित चाइना एयरोस्पेस स्टडीज इंस्टीट्यूट (CASI), जो कि चीन की अंतरिक्ष की गतिविधियों की जानकारी रखने वाली संस्था के तौर पर जानी जाती है के मुताबिक,चीन ने भारत के सैटेलाइट पर बहुत सारे हमले किए हैं।ये हमले साल 2007 से 2018 के बीच किए गए थे।इसके अलावा साल 2017 में इंडिया के सैटेलाइट कम्यूनिकेशन पर भी कम्प्यूटर नेटवर्क का हमला किया गया था।2012 में तो चीन के नेटवर्क आधारित कंप्यूटर अटैक का निशाना जेट प्रोपल्शन लैबोरेट्री (JPL) थी। चीन इस हमले के जरिए JPL के नेटवर्क पर पूरा नियंत्रण पाना चाहता था। रिपोर्ट में कुछ अन्य हमलों की जानकारी के साथ सूत्रों के बारे में भी बताया गया है।
वहीं भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (इसरो) का भी मानना है कि साइबर अटैक कम्युनिकेशन के लिए बड़ा खतरा है, हालांकि अब तक संस्थान के सिस्टम इससे प्रभावित नहीं हुए हैं।

क्या हैं हमलों का कारण

जानकारों के मुताबिक,ऐसे साइबर हमले अक्सर दूसरे देश के सैटेलाइट पर नियंत्रण पाने के लिए किए जाते हैं. कई बार ज़रूरी जानकारियां प्राप्त करने की नीयत से भी ऐसे हमले किए जाते हैं।

CASI की 142 पेज लम्बी रिपोर्ट में ये दावा किया गया है कि चीन के पास ऐसी कई सारी तकनीकें हैं, जिनसे अंतरिक्ष में शत्रु देशों के उपग्रहों को निशाना बनाया जा सकता है।उदाहरण के तौर पर, चीन के पास एक ही कक्षा में भ्रमण करने वाले सैटेलाइट हैं. साथ ही सैटेलाइट को मार गिराने वाली मिसाइलें हैं।जैमर हैं, जो किसी भी सैटेलाइट का सिग्नल जाम कर सकते हैं।
CASI ने अमेरिकी रक्षा विभाग ‘पेंटागन’ की एक रिपोर्ट का भी जिक्र किया है, जिसमें कहा गया है कि चीनी सेना (PLA) लगातार ऐसी तकनीक विकसित करने में जुटी है जिससे दुश्मन को स्पेस तकनीक के इस्तेमाल में बिना संचार के छोड़ा जा सके।

कैसा होता हैं अटैक

दरअसल, सैटेलाइट पर हमले को इलेक्ट्रॉनिक अटैक के जरिए अंजाम दिया जाता है। इसके तहत यदि सैटेलाइट को हाई पावर दे दी जाए तो उसके बर्न आउट होने के चांसेज बढ़ जाते हैं।
इस तरह के हमले के लिए मिसाइल का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि मिसाइल को रडार पकड़ सकता है और उसकी पूर्व सूचना आसानी से हासिल हो सकती है। लेकिन सैटेलाइट पर हुए इलेक्ट्रॉनिक अटैक का पता तभी चलता है जब संचार व्यवस्था में दिक्कत आती है। यही वजह है कि मौजूदा समय में इलेक्ट्रॉनिक अटैक सबसे अधिक खतरनाक है। इस तरह के हमलों में सैटेलाइट के हार्डवेयर को नुकसान पहुंचता है।

भारत को कितना खतरा

सूत्र की माने तो,हाल के कई सालों में इसरो ने साइबर हमलों की तरफ इशारा नहीं किया है।हालांकि साइबर खतरे के संकेत ज़रूर दिए हैं।इसरो ने ये नहीं स्पष्ट किया कि इन साइबर अटैक के खतरों के पीछे कौन है।कहा गया कि एक वरिष्ठ वैज्ञानिक के मुताबिक हमें अलर्ट करने के लिए हमारे पास सिस्टम मौजूद हैं, हमें नहीं लगता कि हमारे सिस्टम से कोई समझौता किया गया. एक वरिष्ठ वैज्ञानिक ने ये भी कहा कि चीन ऐसी कोशिश कर सकता है पर वो फेल होगा।इसरो के अध्यक्ष के सिवन ने भारतीय जमीनी स्टेशनों पर इस तरह के हमले की जानकारी से इंकार किया. उन्होंने कहा कि खतरे की आशंका हमेशा रहती है और ये भारत के लिए कुछ अलग नहीं है. उन्होंने कहा कि हम सुरक्षित हैं. वैज्ञानिक ने कहा कि भारत के पास अपना अलग आइसोलेटिड नेटवर्क है जो पब्लिक डोमेन से जुड़ा नहीं है।हमने अपने सिस्टम को सुरक्षित रखा है।

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