भाजपा हुई 40 साल की, जनता पार्टी में वर्चस्व की लड़ाई के बाद बनी थी

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भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सोमवार को 40 साल की हो गई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के पुराने कार्यकर्ता रहे और संगठन पर 40 से अधिक किताबें लिख चुके नागपुर के दिलीप देवधर के मुताबिक, अगर जनता पार्टी में शामिल समाजवादी धड़े के नेताओं ने जनसंघ के नेताओं को परेशान न किया होता तो शायद भाजपा की स्थापना उस समय न हुई होती। दिलीप देवधर भाजपा के गठन के पीछे तत्कीलन समय जनता पार्टी में मची वर्चस्व की लड़ाई को प्रमुख वजह मानते हैं।

बात इमरजेंसी के दिनों की है। 25 जून 1975 को इंदिरा गांधी ने देश में आंतरिक आपातकाल लगा दिया था। बड़े-बड़े नेता गिरफ्तार हुए या फिर नजरबंद। बावजूद इसके इंदिरा गांधी के खिलाफ आंदोलन तेज हो चला। इस बीच इंदिरा गांधी ने 18 जनवरी, 1977 को लोकसभा भंग कर आम चुनाव का ऐलान कर दिया। तब, जय प्रकाश नारायण के आह्वान पर 23 जनवरी 1977 को जनसंघ, कांग्रेस (ओ), भारतीय लोकदल, सोशलिस्ट पार्टी सहित कई विपक्षी दलों ने मिलकर जनता पार्टी का गठन किया। 1977 में हुए छठे आम चुनाव का नतीजा चौंकाने वाला था। पहली बार देश की जनता ने कोई गैर कांग्रेसी सरकार चुनी।

कुल 542 सीटों में से कांग्रेस को सिर्फ 154 सीटें मिलीं तो जनता पार्टी ने 295 सीटें हासिल कर सत्ता के सिंहासन पर कब्जा कर लिया। कांग्रेस से ही अलग हुए मोरारजी देसाई इस गैर कांग्रेसी जनता पार्टी सरकार में प्रधानमंत्री बने।

मतभेदों के बाद भाजपा का गठन :

जनता पार्टी की सरकार कुछ ही समय में मतभेदों का शिकार हो गई। वर्चस्व की जंग छिड़ गई। कई विचारधाराओं के नेताओं में आपसी संघर्ष छिड़ गया। दिलीप देवधर आईएएनएस से बताते हैं कि तब जनता पार्टी की कमान चंद्रशेखर के हाथ में थी। समाजवादी विचारधारा के मधु लिमये आदि नेताओं ने जनसंघ से जनता पार्टी में गए नेताओं की दोहरी सदस्यता का मुद्दा जोरशोर से उठाना शुरू कर दिया था। कहने लगे कि पार्टी में दो सदस्यता नहीं चलेगी। आरएसएस से जुड़ा कोई भी व्यक्ति जनता पार्टी का सदस्य नहीं रह सकता।

जनता पार्टी में फूट पड़ने के पीछे मधु लिमये की भूमिका ज्यादा थी। फिर जनता पार्टी की कार्यकारिणी ने प्रस्ताव पास कर आरएसएस से जुड़ाव को प्रतिबंधित कर दिया। इस प्रकार जनसंघ से जनता पार्टी में गए नेताओं ने नए राजनीतिक विकल्प पर सोचना शुरू किया। आखिरकार जनता पार्टी से अलग होकर भारतीय जनसंघ से जुड़े अटल बिहारी वाजपेयी, आडवाणी आदि नेताओं ने 6 अप्रैल, 1980 को भारतीय जनता पार्टी के गठन की घोषणा की।

भाजपा का सफर :

सन् 1980 में पार्टी बनने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी पहले अध्यक्ष चुने गए। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए 1984 के चुनाव में कांग्रेस के पक्ष में इस कदर सहानुभूति की लहर चली कि भाजपा को सिर्फ दो सीटें नसीब हुईं। 1986 में लालकृष्ण आडवाणी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। 1989 के आम चुनाव में राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पराजित हुई तो वीपी सिंह के नेतृत्व में राष्ट्रीय मोर्चे की सरकार बनी थी। वीपी सिंह की सरकार को भाजपा ने बाहर से समर्थन दिया था। भाजपा को तब 85 सीटें मिलीं थीं। आडवाणी की रथयात्रा रोके जाने से नाराज भाजपा के समर्थन वापस लेने से वीपी सिंह सरकार गिर गई थी।

सन् 90 के दशक में भाजपा ने राम मंदिर आंदोलन पर फोकस किया। आडवाणी की रथयात्रा हो या फिर कारसेवा। इन सब वजहों से हिंदू मतदाताओं के मन में भाजपा की पैठ बढ़ती गई। इसका असर 1991 के चुनाव में दिखा, जब भाजपा ने 120 सीटें जीतीं। 1991 से 1993 तक मुरली मनोहर जोशी तो 1993 से 1998 तक आडवाणी राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे। आडवाणी के इस दूसरे कार्यकाल में भाजपा उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में जनाधार बढ़ाने में सफल रही। 1996 के आम चुनावों में पार्टी 161 सीटों के साथ सबसे बड़े दल के तौर पर उभरी। पहली बार अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा ने कई दलों के सहयोग से सरकार बनाई। मगर यह सरकार 13 दिनों तक ही चल पाई।

जनता दल के नेतृत्व में अन्य दलों ने सरकार बनाई मगर सरकार नहीं टिक सकी। आखिरकार 1998 के चुनावों में भाजपा को 182 सीटें मिलीं और फिर वाजपेयी की सरकार बनी, मगर जयललिता की पार्टी अन्नाद्रमुक के समर्थन वापस लेने से एक वोट से सरकार गिर गई थी। दूसरी बार वाजपेयी की सरकार 13 महीने तक चली थी। एक बार फिर सरकार गिरने के बाद हुए 1999 के चुनावों में भाजपा ने जहां अकेले 182 सीटें हासिल कीं, वहीं एनडीए सहयोगियों के पास कुल मिलाकर 303 सीटें हुईं। फिर वाजपेयी के नेतृत्व में तीसरी बार सरकार बनी और आडवाणी उप प्रधानमंत्री बने थे।

साल 2004 में वाजपेयी ने समय से छह महीने पहले ही चुनावों कराने का ऐलान कर दिया। इंडिया शाइनिंग के नारे पर चुनाव लड़े एनडीए को हार का सामना करना पड़ा। कांग्रेस नीत यूपीए की 222 की तुलना में उसे 186 सीटें मिलीं। यूपीए की मनमोहन सिंह के नेतृत्व में सरकार बनी। 2009 में फिर भाजपा की हार हुई और उसे सिर्फ 116 सीटें मिलीं। एक बार फिर यूपीए की सरकार बनी।

साल 2014 के चुनाव में मोदी की लहर चली और भाजपा ने अकेले दम पर 282 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया। मई, 2014 में नरेंद्र मोदी ने देश के 15वें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। साल 2019 के लोकसभा चुनाव में दोबारा मोदी लहर चली और पार्टी ने अकेले दम पर 303 सीटें जीतकर केंद्र में सरकार बनाई।

न्यूज स्त्रोत आईएएनएस

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बहुत ही मुश्किल है अपने बारे में लिखना । इसलिए ज्यादा कुछ नहीं, मैं बहुत ही सरल व्यतित्व का व्यक्ति हूं । खुशमिजाज हूं ए इसलिए चेहरे पर हमेशा खुशी रहती हैए और मुझे अकेला रहना ज्यादा पंसद है। मेरा स्वभाव है कि मेरी बजह से किसी का कोई नुकसान नहीं होना चाहिए और ना ही किसी का दिल दुखना चाहिए। चाहे वो व्यक्ति अच्छा हो या बुरा। मेरे इस स्वभाव के कारण कभी कभी मुझे खामियाजा भी भुगतान पड़ता है। मैं अक्सर उनके बारे में सोचकर भुला देता हूं क्योंकि खुश रहने का हुनर सिर्फ मेरे पास है। मेरी अपनी विचारए विचारधारा है जिसे में अभिव्यक्त करता रहता हूं । जिन लोगों के विचारों से कभी प्रभावित भी होता हूं तो उन्हें फोलो कर लेता हूं । अभी सफर की शुरुआत है मैने कंप्यूटर ऑफ माटर्स की डिग्री हासिल की है और इस मीडीया क्षेत्र में अभी नया हूं। मगर मुझे अब इस क्षेत्र में काम करना अच्छा लग रहा है। और फिर इसी में काम करने का मन बना लेना दूसरों के लिये अश्चर्य पूर्ण होगा। लेकिन इससे पहले और आज भी ब्लागर ने एक मंच दिया चिठ्ठा के रुप में, जहां बिना रोक टोक के आसानी से सबकुछ लिखा या बताया जा सका। कभी कभी मन में उठ रही बातों या भावों को शब्दों में पिरोयाए उनमें खुद की और दूसरों की कहानी कही। कभी उनके द्वारा किसी को पुकाराए तो कभी खुद ही रूठ गया। कई बार लिखने पर भी मन सतुष्ट नहीं हुआ और निरंतर कुछ नया लिखने मन बनता रहता है। अजीब सी बेचैनी जो न जाने क्या करवाएगी और कितना कुछ कर गुजर जाने की तमन्ना लिए निकले हैं इन सफरों, जहां उम्मीद और विश्वास दोनों कायम हैं जो अर्जुन के भांति लक्ष्य को भेद देंगे । मुझे अभी अपने जीवन में बहुत कुछ करना है किसी के सपनों को पूरा करना हैं । अब तो बस मेरा एक ही लक्ष्य हैं कि मैं बस उसके सपने पूरें करू।

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