एटोस ने अमेरिकी फर्म सिंटेल का 3.4 अरब डॉलर में अधिग्रहण किया

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फ्रांस की प्रौद्योगिकी सेवा कंपनी एटोस ने 3.4 अरब डॉलर में अमेरिका की सूचना प्रौद्योगिकी कंपनी सिंटेल के अधिग्रहण को पूरा करने की घोषणा की है। कंपनी ने एक बयान में कहा कि इस सौदे को अंतिम रूप दिए जाने के साथ सिंटेल अब एटोस के स्वामित्व वाली सहायक कंपनी हो गई है।

1980 में भारतीय मूल के अमेरिकी दंपति भारत देसाई और नीरजा देसाई द्वारा सह-संस्थापित सिंटेल अपने ग्राहकों को बैंकिंग व वित्तीय सेवाओं, हेल्थकेयर, खुदरा एवं बीमा जैसे कुछ विशेष क्षेत्रों में मूल्य वर्धित डिजिटल सेवाएं पेश करती है।

सिंटेल ने 2017 में 92.4 करोड़ डॉलर का राजस्व अर्जित किया था, जिसमें से 89 प्रतिशत उत्तरी अमेरिका का हिस्सा था। इसके 30 देशों में 23 हजार कर्मचारी काम करते हैं, जिसमें से 18 हजार से ज्यादा भारतीय हैं।

एटोस के अध्यक्ष एवं सीईओ थीयेरी ब्रेटन ने कहा, “आज समूह के विकास में एक बड़ा कदम उठाया गया है। साथ ही सिंटेल के 23 हजार से ज्यादा कर्मचारियों का एटोस में स्वागत है।”

न्यूज स्त्रोत आईएएनएस


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बहुत ही मुश्किल है अपने बारे में लिखना । इसलिए ज्यादा कुछ नहीं, मैं बहुत ही सरल व्यतित्व का व्यक्ति हूं । खुशमिजाज हूं ए इसलिए चेहरे पर हमेशा खुशी रहती हैए और मुझे अकेला रहना ज्यादा पंसद है। मेरा स्वभाव है कि मेरी बजह से किसी का कोई नुकसान नहीं होना चाहिए और ना ही किसी का दिल दुखना चाहिए। चाहे वो व्यक्ति अच्छा हो या बुरा। मेरे इस स्वभाव के कारण कभी कभी मुझे खामियाजा भी भुगतान पड़ता है। मैं अक्सर उनके बारे में सोचकर भुला देता हूं क्योंकि खुश रहने का हुनर सिर्फ मेरे पास है। मेरी अपनी विचारए विचारधारा है जिसे में अभिव्यक्त करता रहता हूं । जिन लोगों के विचारों से कभी प्रभावित भी होता हूं तो उन्हें फोलो कर लेता हूं । अभी सफर की शुरुआत है मैने कंप्यूटर ऑफ माटर्स की डिग्री हासिल की है और इस मीडीया क्षेत्र में अभी नया हूं। मगर मुझे अब इस क्षेत्र में काम करना अच्छा लग रहा है। और फिर इसी में काम करने का मन बना लेना दूसरों के लिये अश्चर्य पूर्ण होगा। लेकिन इससे पहले और आज भी ब्लागर ने एक मंच दिया चिठ्ठा के रुप में, जहां बिना रोक टोक के आसानी से सबकुछ लिखा या बताया जा सका। कभी कभी मन में उठ रही बातों या भावों को शब्दों में पिरोयाए उनमें खुद की और दूसरों की कहानी कही। कभी उनके द्वारा किसी को पुकाराए तो कभी खुद ही रूठ गया। कई बार लिखने पर भी मन सतुष्ट नहीं हुआ और निरंतर कुछ नया लिखने मन बनता रहता है। अजीब सी बेचैनी जो न जाने क्या करवाएगी और कितना कुछ कर गुजर जाने की तमन्ना लिए निकले हैं इन सफरों, जहां उम्मीद और विश्वास दोनों कायम हैं जो अर्जुन के भांति लक्ष्य को भेद देंगे । मुझे अभी अपने जीवन में बहुत कुछ करना है किसी के सपनों को पूरा करना हैं । अब तो बस मेरा एक ही लक्ष्य हैं कि मैं बस उसके सपने पूरें करू।

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