आख़िर क्या है अर्थ ओवरशूट डे, जानिये इसके बारे में

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जयपुर। इस बात को हम जानते है कि प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन से धरती बर्बादी पर उतर आई है। इसका क्या हाल है इसको हम आसानी से देख सकते हैं। तो इसी को ध्यान में रखते हुये अर्थ ओवरशूट डे की एक परिकल्पना की गई है। आपको इसके बारे में जानकरी दे दे कि प्रति वर्ष  अंतरराष्ट्रीय थिंक टैंक ग्लोबल फुटफिंट नेटवर्क (जीएफएन) एक पृथ्वी ओवरशूट डे की गणना करता है। बता दे कि ये वह दिन होता है जब तक हम कुदरत की उतनी चीजों का उपभोग कर चुके होते हैं,

जितने की कमी हमारी पृथ्वी एक साल में फिर से पूरी कर सकती है और ये साल 2017 में यह 2 अगस्त का दिन था। जानकारी दे दे कि जीएफएन के मुताबिक सबसे पहले 1970 में अर्थ ओवरशूट दिवस शुरु किया गया था। वर्तमान में हम 1.6 गुना संसाधन उपभोग करते हैं, जो कि गहन चिंता का विषय है इससे आने वाले समय में  इंसानों के लिए कुछ भी नहीं रहेगा। शोधकर्ताओं ने बताया है कि अगर संसार में हर जगह इंसान जर्मन लोगों की तरह रहने लग जाये तो हमें 3.1 गुना पृथ्वी की आवश्यकता होगी और इसी तरह से अगर अमेरिकियों की तरह जीने लग जाये,

तो आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये पृथ्वी के जैसे लगभग पाँच ग्रह और चाहिये होंगे। जानकारी दे दे कि चीन, अमेरिका, यूरोपीय संघ एवं भारत विश्व के सबसे बड़े कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जक देश हैं जो कि एक धरती को बर्बाद करने के लिए बहुत है। इसके कारण से मृदा के अपरदन को रोकने के लिए, भूजल का लेवल बढ़ाने के लिए तथा जलवायु चक्र संतुलित रखने के लिए पेड़ अतिआवश्यक प्राकृतिक संपदा है और घटते हुये जंगलों से यह संतुलन बिगड़ चुका है। जो कि बहुत ही बड़े खतरे की घंटी है।

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