मनुष्य का प्रमुख कर्तव्य होता है,अपनी वेष-भुषा की रक्षा करना

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एक पौराणिक कथा के अनुसार व्यक्ति का निर्धारण उसकी वेष-भुषा के आधार होता हैं। तो हम एक पौराणिक कथा के आधार इसे समझना चाहते है,एक दिन राजा के दरबार में एक बहुरुपिया पहुंचा। तो राजा ने उनसे कहा कि हम आपकी कला बारे में तब जाने जब आप हमें भुलावें में डाल दो और हम आपको पहचान न पाएं । उस समय बहुरुपिया थोडा सा मुस्कराएँ और सिर झुकाकर चला गया ।

लेकिन कुछ समय बाद जब वे पुन: राजा के दरबार में पहुँचें तो राजा ने उसका अभिवादन करके उनको भोजन करवाया और बहुत सा धन राजे ने उसके चरणों में अर्पित किया लेकिन श्री संत ने धन को लेना दूर की बात उसने उसको स्पर्श तक नही किया और सभा से उठकर चल दिए।

गुरु के आर्शीवाद से व्यक्ति अपने जीवन सब कुछ प्राप्त कर सकता हैं क्योंकि जिसके पास ज्ञान नही होता है,वह अपने जीवन में प्यासे मृग की तरह भटकता रहता हैं। और ज्ञान से रहित व्यक्ति का जीवन अधुरा होता है,जैसे कहा जाता है कि जिसके पास न तो ज्ञान न तप न धर्म न दान होता तो अपने जीवन में भटकता रहता हैं,  अत: व्यक्ति को ज्ञान प्राप्ति में गुरु कि अहम भुमिका होती हैं, उसी प्रकार इस कहानी में श्री संत कुछ देर बाद राजा के दरबार में उपस्थित हुआ और राजा से कहा कि हे राजन अब आप मुझे दक्षिणा दीजिए, तब राजा ने कहा कि तुम्हे किस बात की दक्षिणा चाहिए ,

तब श्री संत ने कहा कि मेरे सच्चे नाटक का, जो आपसे पहले तय हुआ था। कि आपने मुझे कहा था कि जब आप मुझे भुलावा में डाल दोगें तब मे आपको दक्षिणा भेंट करुँगा अब वह समय आ गया है।

जिसका आपनें अभिवादन किया था वह संत मे ही हुँ। जो आप मेरे झूठे नाटक को सच मान लिया और उस बात को आप भुल गए।

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