10 सितंबर वर्ल्ड सुसाइड प्रीवेंशन डे

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विश्व में हर साल लगभग 800000 लोग आत्महत्या जैसे रास्तों को चुन लेते हैं जिसमें से 17% लोग भारत के रहने वाले हैं। भारत में हर साल लगभग 135000 लोग आत्महत्या जैसे बेहद गलत रास्ते को चुन लेते हैं।

हाल की बात करें तो लॉकडाउन के समय कोरोना के अलावा आत्महत्या जैसी क्रियाएं भी एक बड़ी समस्या बन कर उभर आई थी। पब्लिक इंटरेस्ट टेक्नोलॉजिस्ट तेजस जीएन, एक्टिविस्ट कनिका शर्मा, ग्लोबल जिंदल स्कूल ऑफ लॉ के असिस्टेंट प्रोफेसर अमन द्वारा की गई शोध में पाया गया है कि लॉकडाउन के समय कोरोना के अलावा लॉकडाउन से होने वाली असमय मृत्यु में सबसे बड़ा कारण आत्महत्या थी। इनके द्वारा दिए गए आंकड़ों के अनुसार लॉकडाउन के कारण अकेला महसूस करने और कोरोना पॉजिटिव पाय जाने के डर से 80 लोगों ने आत्महत्या जैसा कदम उठा लिया था।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा जारी किए गए आप लोग के अनुसार भारत में 2017 से 2018 के बीच छात्रों के सुसाइड में काफी वृद्धि हुई है 2017 में यह आंकड़ा 9905 प्रतिवर्ष पर था जहां 2018 में यह आंकड़ा बढ़कर 10159 प्रतिवर्ष पर पहुंच गया।भारत में छात्रों के कुल आत्महत्या में से 30% परीक्षा में पास ना हो पाना कारण होता है।

भारत में कुल आत्महत्या का 32% पारिवारिक समस्याओं के कारण उठाया गया कदम है जबकि 25% किसी बीमारी के भय के कारण उठाया गया कदम है। दहेज प्रथा जैसी समस्याएं भारत की कुल आत्महत्या में 8% की भागीदार है और वैवाहिक जीवन में होने वाली अन्य समस्याएं भारत मैं होने वाली कुल आत्महत्या का 7% कारण है।

भारत सरकार कैसे तय करती है कि यह सुसाइड है।

1 प्राकृतिक मृत्यु नहीं होनी चाहिए।

2 मृतक खुद अपनी मौत चाह रहा हो।

3 मृतक के पास आत्महत्या का कोई वजह हो।

 

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